पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * यमराजकी आराधना और गोपीचन्दनका माहात्म्य * ६८७
यज्ञोपवीतका निर्माण कराया है, आप इसे ग्रहण करें और प्रसन्न होकर मेरा मनोरथ पूर्ण करें।'
ताम्बूल-मन्त्र
इदं दत्तं च ताम्बूलं यथाशक्ति सुशोभनम्॥
प्रतिगृह्णीष्व देवेश मामुद्धर भवार्णवात्।
(६८। ६६-६७)
'देवेश ! मैंने यथाशक्ति उत्तम शोभासम्पन्न ताम्बूल दान किया है, इसे स्वीकार करें और भवसागरसे मेरा उद्धार कर दें।'
दीप-आरतीका मन्त्र
पञ्चवर्तिप्रदीपोऽयं देवेशारार्तिकं तव॥
मोहान्धकारद्युमणे भक्तियुक्तो भवार्तिहन्।
(६८। ६७-६८)
'देवेश ! आप मोहरूपी अन्धकार दूर करनेके लिये सूर्यरूप हैं। भव-बन्धनकी पीड़ा हरनेवाले परमात्मन् ! मैं भक्तियुक्त होकर आपकी सेवामें यह पाँच बत्तियोंका दीपक प्रस्तुत करता हूँ। यह आपके लिये आरती है।'
नैवेद्य-मन्त्र
परमान्नं सुपक्वान्नं समस्तरससंयुतम्॥
निवेदितं मया भक्त्या भगवन् प्रतिगृह्यताम्।
(६८। ६८-६९)
'भगवन् ! मैंने सब रसोंसे युक्त सुन्दर पकवान, जो परम उत्तम अन्न है, भक्तिपूर्वक सेवामें निवेदन किया है; आप इसे स्वीकार करें।'
जप-समर्पण
द्वादशाक्षरमन्त्रेण यथासंख्यजपेन च॥
प्रीयतां मे श्रियः कान्तः प्रीतो यच्छतु वाञ्छितम्।
(६८। ६९-७०)
'द्वादशाक्षर मन्त्रका यथाशक्ति जप करनेसे भगवान् लक्ष्मीकान्त मुझपर प्रसन्न हों और प्रसन्न होकर मुझे मनोवाञ्छित वस्तु प्रदान करें।'
इस प्रकार श्रीहरिका पूजन करनेके बाद निम्नाङ्कित मन्त्र पढ़कर गौको प्रणाम करे—
पञ्च गावः समुत्पन्ना मथ्यमाने महोदधौ।
तासां मध्ये तु या नन्दा तस्यै धेनवे नमो नमः॥
(६८। ७०-७१)
'समुद्रका मन्थन होते समय पाँच गौएँ उत्पन्न हुई थीं। उनमेंसे जो नन्दा नामकी धेनु है, उसे मेरा बारम्बार नमस्कार है।'
तत्पश्चात् विधिपूर्वक गौकी पूजा करके निम्नाङ्कित मन्त्रोंद्वारा एकाग्रचित्त हो अर्घ्य प्रदान करे—
सर्वकामदुहे देवि सर्वार्तिकनिवारिणि।
आरोग्यं संततिं दीर्घां देहि नन्दिनि मे सदा॥
पूजिता च वसिष्ठेन विश्वामित्रेण धीमता।
कपिले हर मे पापं यन्मया पूर्वसञ्चितम्॥
गावो मे अग्रतः सन्तु गावो मे सन्तु पृष्ठतः।
नाके मामुपतिष्ठन्तु हेमशृङ्गयः पयोमुचः॥
सुरभ्यः सौरभेयाश्च सरितः सागरास्तथा।
सर्वदेवमये देवि सुभद्रे भक्तवत्सले॥
(६८। ७२-७५)
'समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली तथा सब प्रकारकी पीड़ा हरनेवाली देवी नन्दिनी ! मुझे सर्वदा आरोग्य तथा दीर्घायु संतान प्रदान करो। कपिले ! महर्षि वसिष्ठ तथा बुद्धिमान् विश्वामित्रजीने भी तुम्हारी पूजा की है। मैंने पूर्वजन्ममें जो पाप सञ्चित किया है, उसे हर लो। गौएँ मेरे आगे रहें, गौएँ ही मेरे पीछे रहें तथा स्वर्गलोकमें भी सुवर्णमय सींगोंसे सुशोभित, सरिताओं और समुद्रोंकी भाँति दूधकी धारा बहानेवाली सुरभी और उनकी संतानें मेरे पास आवें। सर्वदेवमयी देवी नन्दिनी ! तुम परम कल्याणमयी और भक्तवत्सला हो। तुम्हें नमस्कार है।'
इस प्रकार विधिवत् पूजा करके गौओंको प्रतिदिन ग्रास समर्पण करे। उसका मन्त्र इस प्रकार है—
सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पापनाशिनीः।
प्रतिगृह्णन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः॥
(६८। ७६-७७)
'सबके हितमें लगी रहनेवाली, पवित्र, पापनाशिनी तथा त्रिभुवनकी माता गौएँ मेरा दिया हुआ ग्रास ग्रहण करें।'
**महादेवजी कहते हैं—**इस प्रकार धर्मराजके मुखसे सुने हुए वैतरणी-व्रतका मेरे आगे वर्णन करके