पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन * ७२१
पावनेशः—पावन वस्तुओंके ईश्वर, ९४३ वरुणः—जलके अधिष्ठाता देवता वरुणरूप, ९४४ यादसां पतिः—जल-जन्तुओंके स्वामी, ९४५ गङ्गा—भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई परम पवित्र नदी, जो भूतलमें भागीरथीके नामसे विख्यात एवं भगवद्विभूति है, ९४६ तीर्थोत्तमः—तीर्थोंमें उत्तम गङ्गारूप, ९४७ द्यूतम्—छल करनेवालोंमें द्यूतरूप भगवान्की विभूति, ९४८ छलकाग्र्यम्—छलकी पराकाष्ठा जूआरूप, ९४९ वरौषधम्—जीवनकी रक्षा करनेवाली श्रेष्ठ ओषधि— अन्नरूप ॥ २९१ ॥
अन्नं सुदर्शनोऽस्त्राग्र्यं वज्रं प्रहरणोत्तमम् ।
उच्चैःश्रवा वाजिराज ऐरावत इभेश्वरः ॥ २९२ ॥
९५० अन्नम्—प्राणियोंकी क्षुधा दूर करनेवाला धरतीसे उत्पन्न खाद्य पदार्थ, ९५१ सुदर्शनः—देखनेमें सुन्दर तेजस्वी अस्त्र—सुदर्शनचक्ररूप, ९५२ अस्त्राग्र्यम्—समस्त अस्त्रोंमें श्रेष्ठ सुदर्शन, ९५३ वज्रम्—इन्द्रके आयुधस्वरूप, ९५४ प्रहरणोत्तमम्—प्रहार करनेयोग्य आयुधोंमें उत्तम वज्ररूप, ९५५ उच्चैःश्रवाः—ऊँचे कानोंवाला दिव्य अश्व, जो समुद्रसे उत्पन्न हुआ था, ९५६ वाजिराजः—घोड़ोंके राजा उच्चैःश्रवारूप, ९५७ ऐरावतः—समुद्रसे उत्पन्न इन्द्रका वाहन ऐरावत नामक हाथी, ९५८ इभेश्वरः—हाथियोंके राजा ऐरावतस्वरूप ॥ २९२ ॥
अरुन्धत्येकपत्नीशो ह्यश्वत्थोऽशेषवृक्षराट् ।
अध्यात्मविद्या विद्याग्र्यः प्रणवश्छन्दसां वरः ॥ २९३ ॥
९५९ अरुन्धती—पतिव्रताओंमें श्रेष्ठ अरुन्धती-स्वरूप, ९६० एकपत्नीशः—पतिव्रता अरुन्धतीके स्वामी महर्षि वसिष्ठरूप, ९६१ अश्वत्थः—पीपलके वृक्षरूप, ९६२ अशेषवृक्षराट्—सम्पूर्ण वृक्षोंके राजा अश्वत्थरूप, ९६३ अध्यात्मविद्या—आत्मतत्त्वका बोध करानेवाली ब्रह्मविद्यास्वरूप, ९६४ विद्याग्र्यः—विद्याओंमें अग्रगण्य प्रणवरूप, ९६५ प्रणवः—ओंकाररूप, ९६६ छन्दसां वरः—वेदोंका आदिभूत ओंकार, अथवा मन्त्रोंमें श्रेष्ठ प्रणव ॥ २९३ ॥
मेरुर्गिरिपतिर्मार्गो मासाग्र्यः कालसत्तमः ।
दिनाद्यात्मा पूर्वसिद्धः कपिलः साम वेदराट् ॥ २९४ ॥
९६७ मेरुः—मेरु नामक दिव्य पर्वतरूप, ९६८ गिरिपतिः—पर्वतोंके स्वामी, ९६९ मार्गः—मार्गशीर्ष (अगहन) का महीना, ९७० मासाग्र्यः—मासोंमें अग्रगण्य मार्गशीर्षस्वरूप, ९७१ कालसत्तमः—समयोंमें सर्वश्रेष्ठ-ब्रह्मवेला, ९७२ दिनाद्यात्मा—दिन और रात्रि दोनोंका सम्मिलित रूप—प्रभात या ब्रह्मवेला, ९७३ पूर्वसिद्धः—आदि सिद्ध महर्षि कपिलरूप, ९७४ कपिलः—कपिल वर्णवाले एक मुनि, जो भगवान्के अवतार हैं, ९७५ साम—सहस्र शाखाओंसे विशिष्ट सामवेद, ९७६ वेदराट्—वेदोंके राजा सामवेदरूप ॥ २९४ ॥
तार्क्ष्यः खगेन्द्र ऋत्वग्र्यो वसन्तः कल्पपादपः ।
दातृश्रेष्ठः कामधेनुरार्तिघ्नाग्र्यः सुहृत्तमः ॥ २९५ ॥
९७७ तार्क्ष्यः—तार्क्ष (कश्यप) ऋषिके पुत्र गरुड़रूप, ९७८ खगेन्द्रः—पक्षियोंके राजा गरुड़, ९७९ ऋत्वग्र्यः—ऋतुओंमें श्रेष्ठ वसन्तरूप, ९८० वसन्तः—चैत्र और वैशाख मास, ९८१ कल्पपादपः—कल्पवृक्षस्वरूप, ९८२ दातृश्रेष्ठः—मनोवाञ्छित वस्तु देनेवालोंमें श्रेष्ठ कल्पवृक्ष, ९८३ कामधेनुः—अभीष्ट पूर्ण करनेवाली गोरूप, ९८४ आर्तिघ्नाग्र्यः—पीड़ा दूर करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, ९८५ सुहृत्तमः—परम हितैषी ॥ २९५ ॥
चिन्तामणिर्गुरुश्रेष्ठो माता हिततमः पिता ।
सिंहो मृगेन्द्रो नागेन्द्रो वासुकिन्नृवरो नृपः ॥ २९६ ॥
९८६ चिन्तामणिः—मनमें चिन्तन की हुई इच्छाको पूर्ण करनेवाली भगवत्स्वरूप दिव्य मणि, ९८७ गुरुश्रेष्ठः—गुरुओंमें श्रेष्ठ मातारूप, ९८८ माता—जन्म देनेवाली जननी, ९८९ हिततमः—सबसे बड़े हितकारी, ९९० पिता—जन्मदाता, ९९१ सिंहः—मृगोंके राजा सिंहरूप, ९९२ मृगेन्द्रः—समस्त वनके जन्तुओंका स्वामी सिंहरूप, ९९३ नागेन्द्रः—नागोंके राजा, ९९४ वासुकिः—नागराज वासुकिरूप, ९९५ नृवरः—मनुष्योंमें श्रेष्ठ, ९९६ नृपः—मनुष्योंका पालन करनेवाले राजारूप ॥ २९६ ॥