भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 737

७२० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण


८९० सद्यःक्ष्मानन्तलक्ष्मीकृत्—पृथ्वीको शीघ्र ही अनन्त लक्ष्मीसे परिपूर्ण करनेवाले, ८९१ नष्टनिःशेषधर्मवित्—नष्ट हुए सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता, ८९२ अनन्तस्वर्णयागैकहेमपूर्णाखिलद्विजः—अनन्त सुवर्णकी दक्षिणाओंसे युक्त यज्ञोंका अनुष्ठान कराकर सम्पूर्ण ब्राह्मणोंको स्वर्णसे सम्पन्न करनेवाले ॥ २८५ ॥

असाध्यैकजगच्छास्ता विश्वबन्धो जयध्वजः ।
आत्मतत्त्वाधिपः कर्तृश्रेष्ठो विधिर्मापतिः ॥ २८६ ॥

८९३ असाध्यैकजगच्छास्ता—किसीके वशमें न होनेवाले सम्पूर्ण जगत्‌के एकमात्र शासक, ८९४ विश्वबन्धः—समस्त विश्वको अपनी मायासे बाँध रखनेवाले, ८९५ जयध्वजः—सर्वत्र अपनी विजयपताका फहरानेवाले, ८९६ आत्मतत्त्वाधिपः—आत्मतत्त्वके स्वामी, ८९७ कर्तृश्रेष्ठः—कर्ताओंमें श्रेष्ठ, ८९८ विधिः—शास्त्रीय विधिरूप, ८९९ उमापतिः—उमाके स्वामी ॥ २८६ ॥

भर्तृश्रेष्ठः प्रजेशाम्र्यो मरीचिर्जनकाग्रणीः ।
कश्यपो देवराडिन्द्रः प्रह्लादो दैत्यराट् शशी ॥ २८७ ॥

९०० भर्तृश्रेष्ठः—भरण-पोषण करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ, ९०१ प्रजेशाम्र्यः—प्रजापतियोंमें अग्रगण्य, ९०२ मरीचिः—मरीचि नामक प्रजापतिरूप, ९०३ जनकाग्रणीः—जन्म देनेवाले प्रजापतियोंमें श्रेष्ठ, ९०४ कश्यपः—सर्वद्रष्टा कश्यप मुनिरूप, ९०५ देवराट्—देवताओंके राजा, ९०६ इन्द्रः—परम ऐश्वर्यशाली इन्द्रस्वरूप, ९०७ प्रह्लादः—भगवद्भक्तिके प्रभावसे अत्यन्त आह्लादपूर्ण रानी कयाधूके पुत्ररूप, ९०८ दैत्यराट्—दैत्योंके स्वामी प्रह्लादरूप, ९०९ शशी—खरगोशका चिह्न धारण करनेवाले चन्द्रमारूप ॥ २८७ ॥

नक्षत्रेशो रविस्तेजःश्रेष्ठः शुक्रः कवीश्वरः ।
महर्षिराड्भृगुर्विष्णुरादित्येशो बलिश्वराट् ॥ २८८ ॥

९१० नक्षत्रेशः—नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमारूप, ९११ रविः—सूर्यस्वरूप, ९१२ तेजःश्रेष्ठः—तेजस्वियोंमें सबसे श्रेष्ठ, ९१३ शुक्रः—भृगुके पुत्र शुक्राचार्यस्वरूप, ९१४ कवीश्वरः—कवियोंके स्वामी, ९१५ महर्षिराट्—महर्षियोंमें अधिक तेजस्वी, ९१६ भृगुः—ब्रह्माजीके पुत्र प्रजापति भृगुस्वरूप, ९१७ विष्णुः—बारह आदित्योंमेंसे एक, ९१८ आदित्येशः—बारह आदित्योंके स्वामी, ९१९ बलिश्वराट्—बलिको इन्द्र बनानेवाले ॥ २८८ ॥

वायुर्वह्निः शुचिश्रेष्ठः शङ्करो रुद्रराड्गुरुः ।
विद्वत्तमश्चित्ररथो गन्धर्वाग्र्योऽक्षरोत्तमः ॥ २८९ ॥

९२० वायुः—वायुतत्त्वके अधिष्ठाता देवता, ९२१ वह्निः—अग्नितत्त्वके अधिष्ठाता देवता, ९२२ शुचिश्रेष्ठः—पवित्रोंमें श्रेष्ठ, ९२३ शङ्करः—सबका कल्याण करनेवाले शिवरूप, ९२४ रुद्रराट्—ग्यारह रुद्रोंके स्वामी, ९२५ गुरुः—गुरु नामसे प्रसिद्ध अङ्गिरापुत्र बृहस्पतिरूप, ९२६ विद्वत्तमः—सर्वश्रेष्ठ विद्वान्, ९२७ चित्ररथः—विचित्र रथवाले गन्धर्वोंके राजा, ९२८ गन्धर्वाग्र्यः—गन्धर्वोंमें अग्रगण्य चित्रथरूप, ९२९ अक्षरोत्तमः—अक्षरोंमें उत्तम 'ॐ'कारस्वरूप ॥ २८९ ॥

वर्णादिरग्र्यस्त्री गौरी शक्त्यग्र्या श्रीश्च नारदः ।
देवर्षिराट्पाण्डवाग्र्योऽर्जुनो वादः प्रवादराट् ॥ २९० ॥

९३० वर्णादिः—समस्त अक्षरोंके आदिभूत अकारस्वरूप, ९३१ अग्र्यस्त्री—स्त्रियोंमें अग्रगण्य सती पार्वतीरूप, ९३२ गौरी—गौरवर्णा उमारूप, ९३३ शक्त्यग्र्या—भगवान्‌की अन्तरङ्गा शक्तियोंमें सर्वश्रेष्ठ भगवती लक्ष्मीरूप, ९३४ श्रीः—भगवान् विष्णुका आश्रय लेनेवाली लक्ष्मी, ९३५ नारदः—सबको ज्ञान देनेवाले देवर्षि नारदरूप, ९३६ देवर्षिराट्—देवर्षियोंके राजा, ९३७ पाण्डवाग्र्यः—पाण्डवोंमें अपने गुणोंके कारण श्रेष्ठ अर्जुनरूप, ९३८ अर्जुनः—अर्जुन नामसे प्रसिद्ध कुन्तीके तृतीय पुत्र, ९३९ वादः—तत्त्वनिर्णयके उद्देश्यसे शुद्ध नीयतके साथ किये जानेवाले शास्त्रार्थरूप, ९४० प्रवादराट्—उत्तम वाद करनेवालोंमें श्रेष्ठ ॥ २९० ॥

पावनः पावनेशानो वरुणो यादसां पतिः ।
गङ्गा तीर्थोत्तमो द्यूतं छलकाग्र्यं वरोषधम् ॥ २९१ ॥

९४१ पावनः—सबको पवित्र करनेवाले, ९४२

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