भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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...] उत्तराखण्ड ] • नाम-कीर्तनकी महिमा तथा श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रका वर्णन • ७१९


८५४ महाभारतनिर्माता—महाभारत ग्रन्थके रचयिता, ८५५ कवीन्द्रः—कवियोंके राजा, ८५६ बादरायणः—बदरी-वनमें उत्पन्न भगवान् वेदव्यास-रूप, ८५७ कृष्णद्वैपायनः—द्वीपमें उत्पन्न श्याम वर्णवाले व्यासजी, ८५८ सर्वपुरुषार्थैकबोधकः—समस्त पुरुषार्थोंके एकमात्र बोध करानेवाले ॥ २७८ ॥ वेदान्तकर्ता ब्रह्मैकव्यञ्जकः पुरुवंशकृत् । बुद्धो ध्यानजिताशेषदेवदेवीजगत्प्रियः ॥ २७९ ॥ ८५९ वेदान्तकर्ता—वेदान्तसूत्रोंके रचयिता, ८६० ब्रह्मैकव्यञ्जकः—एक अद्वितीय ब्रह्मकी अभिव्यक्ति करानेवाले, ८६१ पुरुवंशकृत्—पुरुवंशकी परम्परा सुरक्षित रखनेवाले, ८६२ बुद्धः—भगवान्के अवतार बुद्धदेव, ८६३ ध्यानजिताशेषदेवदेवीजगत्प्रियः—ध्यानके द्वारा समस्त देव-देवियोंको जीतकर जगत्के प्रियतम बननेवाले ॥ २७९ ॥ निरायुधो जगज्जैत्रः श्रीधनो दुष्टमोहनः । दैत्यवेदबहिष्कर्ता वेदार्थश्रुतिगोपकः ॥ २८० ॥ ८६४ निरायुधः—अस्त्र-शस्त्रोंका त्याग करनेवाले, ८६५ जगज्जैत्रः—सम्पूर्ण जगत्को वशमें करनेवाले, ८६६ श्रीधनः—शोभाके धनी, ८६७ दुष्टमोहनः—दुष्टोंको मोहित करनेवाले, ८६८ दैत्यवेदबहिष्कर्ता—दैत्योंको वेदसे बहिष्कृत करनेवाले, ८६९ वेदार्थश्रुतिगोपकः—वेदोंके अर्थ और श्रुतियोंको गुप्त रखनेवाले ॥ २८० ॥ शौद्धोदनिर्दिष्टदिष्टः सुखदः सदसस्पतिः । यथायोग्याखिलकृपः सर्वशून्योऽखिलेष्टदः ॥ २८१ ॥ ८७० शौद्धोदनिः—कपिलवस्तुके राजा शुद्धोदनके पुत्र, ८७१ दृष्टदिष्टः—दैवके विधानको प्रत्यक्ष देखनेवाले, ८७२ सुखदः—सबको सुख देनेवाले, ८७३ सदसस्पतिः—सत्पुरुषोंकी सभाके अध्यक्ष, ८७४ यथायोग्याखिलकृपः—यथायोग्य सम्पूर्ण जीवोंपर कृपा रखनेवाले, ८७५ सर्वशून्यः—सम्पूर्ण पदार्थोंको शून्यरूप ही माननेवाले, ८७६ अखिलेष्टदः—सबको सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ देनेवाले ॥ २८१ ॥ चतुष्कोटिपृथक्तत्त्वप्रज्ञापारमितेश्वरः । पाखण्डवेदमार्गेशः पाखण्डश्रुतिगोपकः ॥ २८२ ॥ ८७७ चतुष्कोटिपृथक्—स्थावर आदि चार श्रेणियोंमें विभक्त हुई सृष्टिसे पृथक्, ८७८ तत्त्व-प्रज्ञापारमितेश्वरः—तत्त्वभूत प्रज्ञापारमिता<sup></sup> (बुद्धिकी पराकाष्ठा) के ईश्वर, ८७९ पाखण्डवेदमार्गेशः—पाखण्ड-वेदमार्गके स्वामी, ८८० पाखण्ड-श्रुतिगोपकः—पाखण्डके द्वारा प्रतिपादित वेदकी श्रुतियोंके रक्षक ॥ २८२ ॥ कल्की विष्णुयशःपुत्रः कलिकालविलोपकः । समस्तम्लेच्छदुष्टघ्नः सर्वशिष्टद्विजातिकृत् ॥ २८३ ॥ ८८१ कल्की—कलियुगके अन्तमें होनेवाला भगवान्का एक अवतार, ८८२ विष्णुयशःपुत्रः—श्रीविष्णुयशाके पुत्र भगवान् कल्कि, ८८३ कलिकाल-विलोपकः—कलियुगका लोप करके सत्ययुगका प्रवेश करानेवाले, ८८४ समस्तम्लेच्छदुष्टघ्नः—सम्पूर्ण म्लेच्छों और दुष्टोंका वध करनेवाले, ८८५ सर्वशिष्टद्विजातिकृत्—सबको श्रेष्ठ द्विज बनानेवाले अथवा समस्त साधु द्विजातियोंके रक्षक ॥ २८३ ॥ सत्यप्रवर्तको देवद्विजदीर्घक्षुधापहः । अश्ववारादिक्रान्तपृथ्वीदुर्गतिनाशनः ॥ २८४ ॥ ८८६ सत्यप्रवर्तकः—सत्ययुगकी प्रवृत्ति करानेवाले, ८८७ देवद्विजदीर्घक्षुधापहः—[यज्ञ और ब्राह्मण-भोजन आदिका प्रचार करके] देवताओं और ब्राह्मणोंकी बढ़ी हुई भूखको शान्त करनेवाले, ८८८ अश्ववारादिः—घुड़सवारोंमें श्रेष्ठ, ८८९ एकान्तपृथ्वीदुर्गतिनाशनः—पृथ्वीकी दुर्गतिका पूर्णतया नाश करनेवाले ॥ २८४ ॥ सद्यःक्ष्मानन्तलक्ष्मीकृन्नष्टनिःशेषधर्मवित् । अनन्तस्वर्णयागैकहेमपूर्णाखिलद्विजः ॥ २८५ ॥


१-दस पारमिताओंमेंसे एकका नाम प्रज्ञापारमिता है।