पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 748, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तराखण्ड ] * न्याससहित अपामार्जननामक स्तोत्र और उसकी महिमा * ७३१
बाँधना पड़ता है और न कृत्याके ही स्पर्शका भय रहता है। श्रीजनार्दनके प्रसन्न होनेपर समस्त दोषोंका नाश हो जाता है। सभी ग्रह सदाके लिये शुभ हो जाते हैं तथा वह मनुष्य देवताओंके लिये भी दुर्धर्ष बन जाता है। जो सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति समान भाव रखता है और अपने प्रति जैसा बर्ताव चाहता है वैसा ही दूसरोंके प्रति भी करता है, उसने मानो उपवास आदि करके भगवान् मधुसूदनको संतुष्ट कर लिया। ऐसे लोगोंके पास शत्रु नहीं आते, उन्हें रोग या आभिचारिक कष्ट नहीं होता तथा उनके द्वारा कभी पापका कार्य भी नहीं बनता। जिसने भगवान् विष्णुकी उपासना की है, उसे भगवान्के चक्र आदि अमोघ अस्त्र सदा सब आपत्तियोंसे बचाते रहते हैं।
पार्वती बोलीं— भगवन् ! जो लोग भगवान् गोविन्दकी आराधना न करनेके कारण दुःख भोग रहे हैं, उन दुःखी मनुष्योंके प्रति सब प्राणियोंमें सनातन वासुदेवको स्थित देखनेवाले समदर्शी एवं दयालु पुरुषोंका जो कर्तव्य हो, वह मुझे विशेषरूपसे बताइये।
महादेवजी बोले— देवेश्वरि ! बतलाता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। यह उपाय रोग, दोष एवं अशुभको हरनेवाला तथा शत्रुजनित आपत्तिका नाश करनेवाला है। विद्वान् पुरुष शिखामें श्रीधरका, शिखाके निचले भागमें भगवान् श्रीकरका, केशोंमें हृषीकेशका, मस्तकमैं परम पुरुष नारायणका, कानके ऊपरी भागमें श्रीविष्णुका, ललाटमें जलशायीका, दोनों भौंहोंमें श्रीविष्णुका, भौंहोंके मध्य-भागमें श्रीहरिका, नासिकाके अग्रभागमें नरसिंहका, दोनों कानोंमें अर्णवेशय (समुद्रमें शयन करनेवाले भगवान्) का, दोनों नेत्रोंमें पुण्डरीकाक्षका, नेत्रोंके नीचे भूधर (धरणीधर) का, दोनों गालोंमें कल्किनाथका, कानोंके मूल भागमें वामनका, गलेकी दोनों हँसलियोंमें शङ्खधारीका, मुखमें गोविन्दका, दाँतोंकी पङ्क्तिमें मुकुन्दका, जिह्वामें वाणीपतिका, ठोढ़ीमें श्रीरामका, कण्ठमें वैकुण्ठका, बाहुमूलके निचले भाग (काँख) में बलघ्न (बल नामक दैत्यके मारनेवाले) का, कंधोंमें कंसघातीका, दोनों भुजाओंमें अज (जन्मरहित) का, दोनों हाथोंमें शार्ङ्गपाणिका, हाथके अँगूठेमें संकर्षणका, अँगुलियोंमें गोपालका, वक्षःस्थलमें अधोक्षजका, छातीके बीचमें श्रीवत्सका, दोनों स्तनोंमें अनिरुद्धका, उदरमें दामोदरका, नाभिमें पद्मनाभका, नाभिके नीचे केशवका, लिङ्गमें धराधरका, गुदामें गदाग्रजका, कटिमें पीताम्बरधारीका, दोनों जाँघोंमें मधुद्विट् (मधुसूदन) का, पिडलियोंमें मुरारिका, दोनों घुटनोंमें जनार्दनका, दोनों घुट्ठियोंमें फणीशका, दोनों पैरोंकी गतिमें त्रिविक्रमका, पैरके अँगूठेमें श्रीपतिका, पैरके तलवोंमें धरणीधरका, समस्त रोमकूपोंमें विष्वक्सेनका, शरीरके मांसमें मत्स्यावतारका, मेदमें कूर्मावतारका, वसा में वाराहका, सम्पूर्ण हड्डियोंमें अच्युतका, मज्जामें द्विजप्रिय (ब्राह्मणोंके प्रेमी) का, शुक्र (वीर्य) में श्वेतपतिका, सर्वाङ्गमें यज्ञपुरुषका तथा आत्मामें परमात्माका न्यास करे। इस प्रकार न्यास करके मनुष्य साक्षात् नारायण हो जाता है; वह जबतक मुँहसे कुछ बोलता नहीं, तबतक विष्णुरूपसे ही स्थित रहता है।*
* तद् वक्ष्यामि सुरश्रेष्ठे समाहितमनाः शृणु। रोगदोषाशुभहरं विद्विडापदविनाशनम् ॥
शिखायां श्रीधरं न्यस्य शिखाधः श्रीकरं तथा। हृषीकेशं तु केशेषु मूर्ध्नि नारायणं परम् ॥
ऊर्ध्वश्रोत्रे न्यसेद्विष्णुं ललाटे जलशायिनम्। विष्णुं वै भ्रुयुगे न्यस्य भ्रूमध्ये हरिमेव च ॥
नरसिंहं नासिकाग्रे कर्णयोरर्णवेशयम्। चक्षुषोः पुण्डरीकाक्षं तदधो भूधरं न्यसेत् ॥
कपोलयोः कल्किनाथं वामनं कर्णमूलयोः। शङ्खिनं शङ्खयोर्न्यस्य गोविन्दं वदने तथा ॥
मुकुन्दं दन्तपङ्क्तौ तु जिह्वायां वाक्पतिं तथा। रामं हनौ तु विन्यस्य कण्ठे वैकुण्ठमेव च ॥
बलघ्नं बाहुमूलाधश्शंसयोः कंसघातिनम्। अजं भुजद्वये न्यस्य शार्ङ्गपाणिं करद्वये ॥
संकर्षणं कराङ्गुष्ठे गोपमङ्गुलिपङ्क्तिषु। वक्षस्यधोक्षजं न्यस्य श्रीवत्सं तस्य मध्यतः ॥
स्तनयोरनिरुद्धं च दामोदरमथोदरे। पद्मनाभं तथा नाभौ नाभ्यधश्चापि केशवम् ॥