पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३२ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
शान्ति करनेवाला पुरुष मूलसहित शुद्ध कुशोंको लेकर एकाग्रचित्त हो रोगीके सब अङ्गोंको झाड़े; विशेषतः विष्णुभक्त पुरुष रोग, ग्रह और विषसे पीड़ित मनुष्यकी अथवा केवल विषसे ही कष्ट पानेवाले रोगियोंकी इस प्रकार शुभ शान्ति करे। पार्वती ! कुशसे झाड़ते समय सब रोगोंका नाश करनेवाले इस स्तोत्रका पाठ करना चाहिये।
ॐ परमार्थस्वरूप, अन्तर्यामी, महात्मा, रूपहीन होते हुए भी अनेक रूपधारी तथा व्यापक परमात्माको नमस्कार है। वाराह, नरसिंह और सुखदायी वामन भगवान्का ध्यान एवं नमस्कार करके श्रीविष्णुके उपर्युक्त नामोंका अपने अङ्गोंमें न्यास करे। न्यासके पश्चात् इस प्रकार कहे—'मैं पापके स्पर्शसे रहित, शुद्ध, व्याधि और पापोंका अपहरण करनेवाले गोविन्द, पद्मनाभ, वासुदेव और भूधर नामसे प्रसिद्ध भगवान्को नमस्कार करके जो कुछ कहूँ, वह मेरा सारा वचन सिद्ध हो। तीन पगोंसे त्रिलोकीको नापनेवाले भगवान् त्रिविक्रम, सबके हृदयमें रमण करनेवाले राम, वैकुण्ठधामके अधिपति, बदरिकाश्रममें तपस्या करनेवाले भगवान् नर, वाराह, नृसिंह, वामन और उज्ज्वल रूपधारी हयग्रीवको नमस्कार है। हृषीकेश ! आप सारे अमङ्गलको हर लीजिये। सबके हृदयमें निवास करनेवाले भगवान् वासुदेवको नमस्कार है। नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्णको नमस्कार है। कमलके समान नेत्रोंवाले आदि चक्रधारी श्रीकेशवको नमस्कार है। कमल-केसरके समान वर्णवाले भगवान्को नमस्कार है। पीले रंगके निर्मल वस्त्र धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको नमस्कार है। अपनी एक दाढ़पर समूची पृथ्वीको उठा लेनेवाले त्रिमूर्तिपति भगवान् वाराहको नमस्कार है। जिसके नखोंका स्पर्श वज्रसे भी अधिक तीक्ष्ण और कठोर है, ऐसे दिव्य सिंहका रूप धारण करनेवाले भगवान् नृसिंह ! आपको नमस्कार है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदसे लक्षित होनेवाले परमात्मन् ! अत्यन्त लघु शरीरवाले कश्यपपुत्र वामनका रूप धारण करके भी समूची पृथ्वीको एक ही पगमें नाप लेनेवाले ! आपको बारंबार नमस्कार है। बहुत बड़ी दाढ़वाले भगवान् वाराह ! सम्पूर्ण दुःखों और समस्त पापके फलोंको रौंद डालिये, रौंद डालिये। पापके फलको नष्ट कर डालिये, नष्ट कर डालिये। विकराल मुख और दाँतोंवाले, नखोंसे उद्दीप्त दिखायी देनेवाले, पीड़ाओंके नाशक भगवान् नृसिंह ! आप अपनी गर्जनासे इस रोगीके दुःखोंका भञ्जन कीजिये, भञ्जन कीजिये। इच्छानुसार रूप ग्रहण करके पृथ्वी आदिको धारण करनेवाले भगवान् जनार्दन अपनी ऋक्, यजुः और साममयी वाणीद्वारा इस रोगीके सब दुःखोंकी शान्ति कर दें। एक, दो, तीन या चार दिनका अन्तर देकर आनेवाले हलके या भारी ज्वरको, सदा बने रहनेवाले ज्वरको, किसी दोषके कारण उत्पन्न हुए ज्वरको, सन्निपातसे होनेवाले तथा आगन्तुक ज्वरको विदीर्ण कर उसकी वेदनाका नाश करके भगवान् गोविन्द उसे सदाके लिये शान्त कर दें। नेत्रका कष्ट, मस्तकका कष्ट, उदररोगका कष्ट, अनुच्छ्वास (साँसका रुकना), महाश्वास (साँसका तेज चलना—दमा), परिताप, (ज्वर), वेपथु (कम्प या जूड़ी), गुदारोग, नासिकारोग, पादरोग, कुष्ठरोग, क्षयरोग, कमला आदि रोग, प्रमेह आदि भयङ्कर रोग, वातरोग, मकड़ी और चेचक आदि समस्त रोग भगवान् विष्णुके चक्रकी चोट खाकर नष्ट हो जायें। अच्युत, अनन्त और गोविन्द नामोंके उच्चारणरूपी
मेढ़े धराधरं देवं गुदे चैव गदाग्रजम्। पीताम्बरधरं कट्यामूरुयुगे मधुद्विषम्॥
मुरद्विषं पिण्डकयोर्जानुयुग्मे जनार्दनम्। फणीशं गुल्फयोर्यस्य क्रमयोश्च त्रिविक्रमम्॥
पादाङ्गुष्ठे श्रीपतिं च पादाधो धरणीधरम्। रोमकूपेषु सर्वेषु विष्वक्सेनं न्यसेद्बुधः॥
मत्स्यं मांसे तु विन्यस्य कूर्मं मेदसि विन्यसेत्। वाराहं तु वसामध्ये सर्वास्थिषु तथाच्युतम्॥
द्विजप्रियं तु मज्जायां शुक्रे श्वेतपतिं तथा। सर्वाङ्गे यज्ञपुरुषं परमात्मानमात्मनि॥
एवं न्यासविधिं कृत्वा साक्षान्नारायणो भवेत्। यावन्न व्याहरेत्किंचितावद्विष्णुमयः स्थितः॥ (७९। १६—३०)