भारतकोश
पद्म पुराण

पद्म पुराण

Padma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,018 पृष्ठ

पृष्ठ 750, कुल 1018 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 750

उत्तरखण्ड ] * न्याससहित अपामार्जननामक स्तोत्र और उसकी महिमा * ७३३ ************************************************************************

ओषधिसे समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं—यह बात मैं सत्य-सत्य कहता हूँ। स्थावर, जङ्गम अथवा कृत्रिम विष हो या दाँत, नख, आकाश तथा भूत आदिसे प्रकट होनेवाला अत्यन्त दुस्सह विष हो; वह सारा-का-सारा श्रीजनार्दनका नामकीर्तन करनेपर इस रोगीके शरीरमें शान्त हो जाय। बालकके शरीरमें ग्रह, प्रेतग्रह अथवा अन्यान्य शाकिनी-ग्रहोंका उपद्रव हो या मुखपर चकत्ते निकल आये हों अथवा रेवती, वृद्ध रेवती तथा वृद्धिका नामके भयङ्कर ग्रह, मातृग्रह एवं बालग्रह पीड़ा दे रहे हों; भगवान् श्रीविष्णुका चरित्र उन सबका नाश कर देता है। वृद्धों अथवा बालकोंपर जो कोई भी ग्रह लगे हों, वे श्रीनृसिंहके दर्शनमात्रसे तत्काल शान्त हो जाते हैं। भयानक दाढ़ोंके कारण विकराल मुखवाले भगवान् नृसिंह दैत्योंको भयभीत करनेवाले हैं। उन्हें देखकर सभी ग्रह बहुत दूर भाग जाते हैं। ज्वालाओंसे देदीप्यमान मुखवाले महासिंहरूपधारी नृसिंह ! सुन्दर मुख और नेत्रोंवाले सर्वेश्वर ! आप समस्त दुष्ट ग्रहोंको दूर कीजिये। जो-जो रोग, महान् उत्पात, विष, महान् ग्रह, क्रूरस्वभाववाले भूत, भयङ्कर ग्रह-पीड़ाएँ, हथियारसे कटे हुए घावोंपर होनेवाले रोग, चेचक आदि फोड़े और शरीरके भीतर स्थित रहनेवाले ग्रह हों, उन सबको हे त्रिभुवनकी रक्षा करनेवाले ! दुष्ट दानवोंके विनाशक ! महातेजस्वी सुदर्शन ! आप काट डालिये, काट डालिये। महान् ज्वर, वातरोग, लूता रोग तथा भयानक महाविषको भी आप नष्ट कर दीजिये, नष्ट कर दीजिये। असाध्य अमरशूल विषकी ज्वाला और गर्दभ रोग—ये सब-के-सब शत्रु हैं, 'ॐ ह्रां ह्रां हूं हूं' इस बीजमन्त्रके साथ तीखी धारवाले कुठारसे आप इन शत्रुओंको मार डालें। दूसरोंका दुःख दूर करनेके लिये शरीर धारण करनेवाले परमेश्वर ! आप भगवान्‌को नमस्कार है। इनके सिवा और भी जो प्राणियोंको पीड़ा देनेवाले दुष्ट ग्रह और रोग हों, उन सबको सबके आत्मा परमात्मा जनार्दन दूर करें। वासुदेव ! आपको नमस्कार है। आप कोई रूप धारण करके ज्वालाओंके कारण अत्यन्त भयानक सुदर्शन नामक चक्र चलाकर सब दुष्टोंको नष्ट कर दीजिये। देववर ! अच्युत ! आप दुष्टोंका संहार कीजिये।

महाचक्र सुदर्शन ! भगवान् गोविन्दके श्रेष्ठ आयुध ! तीखी धार और महान् वेगवाले शस्त्र ! कोटि सूर्यके समान तेज धारण करनेवाले महाज्वालामय सुदर्शन ! भारी आवाजसे सबको भयभीत करनेवाले चक्र ! आप समस्त दुःखों और सम्पूर्ण राक्षसोंका उच्छेद कर डालिये, उच्छेद कर डालिये। हे सुदर्शनदेव ! आप पापोंका नाश और आरोग्य प्रदान कीजिये। महात्मा नृसिंह अपनी गर्जनाओंसे पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर—सब ओर रक्षा करें। अनेक रूप धारण करनेवाले भगवान् जनार्दन भूमिपर और आकाशमें, पीछे-आगे तथा पार्श्वभागमें रक्षा करें। देवता, असुर और मनुष्योंके सहित सम्पूर्ण विश्व श्रीविष्णुमय है। योगेश्वर श्रीविष्णु ही सब वेदोंमें गाये जाते हैं, इस सत्यके प्रभावसे इस रोगीका सारा दुःख दूर हो जाय। समस्त वेदाङ्गोंमें भी परमात्मा श्रीविष्णुका ही गान किया जाता है। इस सत्यके प्रभावसे विश्वात्मा केशव इसको सुख देनेवाले हों। भगवान् वासुदेवके शरीरसे प्रकट हुए कुशोंके द्वारा मैंने इस मनुष्यका मार्जन किया है; इससे शान्ति हो, कल्याण हो और इसके दुःखोंका नाश हो जाय। जिसने गोविन्दके अपामार्जन स्तोत्रसे मार्जन किया है, वह भी यद्यपि साक्षात् श्रीनारायणका ही स्वरूप है; तथापि सब दुःखोंकी शान्ति श्रीहरिके वचनसे ही होती है। श्रीमधुसूदनका स्मरण करनेपर सम्पूर्ण दोष, समस्त ग्रह, सभी विष और सारे भूत शान्त हो जाते हैं। अब यह श्रीहरिके वचनानुसार पूर्ण स्वस्थ हो जाय। शान्ति हो, कल्याण हो और दुःख नष्ट हो जायँ। भगवान् हृषीकेशके नाम-कीर्तनके प्रभावसे सदा ही इसके स्वास्थ्यकी रक्षा रहे। जो पाप जहाँसे इसके शरीरमें आये हों, वे वहीं चले जायँ।

यह परम उत्तम 'अपामार्जन' नामक स्तोत्र है। समस्त प्राणियोंका कल्याण चाहनेवाले श्रीविष्णुभक्त पुरुषोंको रोग और पीड़ाओंके समय इसका प्रयोग करना चाहिये। इससे समस्त दुःखोंका पूर्णतया नाश हो जाता है। यह