पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 762, कुल 1018 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरखण्ड ] * चैत्र और वैशाख मासके विशेष उत्सवका वर्णन * ७४५
भगवान् श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। वे सर्वेश्वर पुण्यस्वरूप वैष्णवोंको सब कुछ देते हैं। जो शिवकी पूजा नहीं करता और श्रीविष्णुकी निन्दामें तत्पर रहता है, उसे निश्चय ही रौरव नरकमें निवास करना पड़ता है। मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही रुद्र हूँ और मैं ही पितामह ब्रह्मा हूँ। मैं ही सदा सब भूतोंमें निवास किया करता हूँ।
★
चैत्र और वैशाख मासके विशेष उत्सवका वर्णन, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़में जलस्थ श्रीहरिके पूजनका महत्त्व
पार्वती बोलीं— महेश्वर! सब महीनोंकी विधिका वर्णन कीजिये। प्रत्येक मासमें कौन-कौन-से महोत्सव करने चाहिये और उनके लिये उत्तम विधि क्या है ? सुरेश्वर ! किस महीनेका कौन देवता है ? किसकी पूजा करनी चाहिये, उस पूजनकी महिमा कैसी है और वह किस तिथिको करना उचित है ?
महादेवजी बोले— देवि ! मैं प्रत्येक मासके उत्सवकी विधि बतलाता हूँ। पहले चैत्र मासके शुक्लपक्षमें विशेषतः एकादशी तिथिको भगवान्को झूलेपर बिठाकर पूजा करनी चाहिये। यह दोलारोहणका उत्सव बड़ी भक्तिके साथ और विधिपूर्वक मनाना चाहिये। पार्वती ! जो लोग कलियुगके पाप-दोषका अपहरण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णको झूलेपर विराजमान देखते हैं—उस रूपमें उनकी झाँकी करते हैं, वे सहस्रों अपराधोंसे मुक्त हो जाते हैं। करोड़ों जन्मोंमें किये हुए पाप तभीतक मौजूद रहते हैं, जबतक मनुष्य विश्वके स्वामी भगवान् जगन्नाथको झूलेपर बिठाकर उन्हें अपने हाथसे झुलाता नहीं। जो लोग कलियुगमें झूलेपर बैठे हुए जनार्दनका दर्शन करते हैं, वे गोहत्यारे हों तो भी मुक्त हो जाते हैं; फिर औरोंकी तो बात ही क्या है। दोलोत्सवसे प्रसन्न होकर समस्त देवता भगवान् शङ्करको साथ लेकर झूलेपर बैठे हुए श्रीविष्णुकी झाँकी करनेके लिये आते हैं और आँगनमें खड़े हो हर्षमें भरकर स्वयं भी नाचते, गाते एवं बाजे बजाते हैं। वासुकि आदि नाग और इन्द्र आदि देवता भी दर्शनके लिये पधारते हैं। भगवान् विष्णुको झूलेपर विराजमान देख तीनों लोकोंमें उत्सव होने लगता है; अतः सैकड़ों कार्य छोड़कर दोलोत्सवके दिन झूलनका उत्सव करो। जो लोग झूलेपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णके सामने रात्रिमें जागरण करते हैं, उन्हें एक निमेषमें ही सब पुण्योंकी प्राप्ति हो जाती है। सुरेश्वरि ! झूलेपर विराजमान दक्षिणाभिमुख भगवान् गोविन्दका एक बार भी दर्शन करके मनुष्य ब्रह्महत्याके पापसे छूट जाता है।
ॐ दोलारूढाय विद्महे माधवाय च धीमहि। तन्नो देवः प्रचोदयात् ॥
'झूलेपर बैठे हुए भगवान्का तत्त्व जाननेके लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं। श्रीमाधवका ध्यान करते हैं। अतः वे देव—भगवान् विष्णु हमलोगोंकी बुद्धिको प्रेरित करें।'
इस गायत्री-मन्त्रके द्वारा भगवान्का पूजन करना चाहिये। 'माधवाय नमः', 'गोविन्दाय नमः' और 'श्रीकण्ठाय नमः' इन मन्त्रोंसे भी पूजन किया जा सकता है। मन्त्रोच्चारणके साथ विधिपूर्वक पूजन करना उचित है। एकाग्रचित्त होकर गुरुको यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये तथा निरन्तर भक्तिपूर्वक श्रीविष्णुकी लीलाओंका गान करते रहना चाहिये। इससे उत्सव पूर्ण होता है। सुमुखि ! और अधिक कहनेसे क्या लाभ। झूलेपर विराजमान भगवान् विष्णु सब पापोंको हरनेवाले हैं। जहाँ दोलोत्सव होता है, वहाँ देवता, गन्धर्व, किन्नर और ऋषि बहुधा दर्शनके लिये आते हैं। उस समय 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस मन्त्रद्वारा षोडशोपचारसे विधिवत् पूजा करनी उचित है। इससे सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं।' सुव्रते ! अङ्गन्यास, करन्यास तथा शरीरन्यास—सब कुछ द्वादशाक्षर मन्त्रसे करना चाहिये और इस आगमोक्त मन्त्रसे ही महान् उत्सवका कार्य सम्पन्न करना चाहिये। झूलेपर सबसे