पद्म पुराण
Padma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४६ * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण
ऊँचे लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुको बैठाना चाहिये। भगवान्के आगे [कुछ नीची सतहमें] वैष्णवोंको, नारदादि देवर्षियोंको तथा विष्वक्सेन आदि भक्तोंको स्थापित करना चाहिये। फिर पाँच प्रकारके बाजोंकी आवाजके साथ विद्वान् पुरुष भगवान्की आरती करे और प्रत्येक पहरमें यत्नपूर्वक पूजा भी करता रहे। तत्पश्चात् नारियल तथा सुन्दर केलोंके साथ जलसे भगवान्को अर्घ्य दे। अर्घ्यका मन्त्र इस प्रकार है—
देवदेव जगन्नाथ शङ्खचक्रगदाधर ।
अर्घ्यं गृहाण मे देव कृपां कुरु ममोपरि ॥
(८५।३१)
'देवताओंके देवता, जगत्के स्वामी तथा शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले दिव्यस्वरूप नारायण ! यह अर्घ्य ग्रहण करके मुझपर कृपा कीजिये।'
तदनन्तर भगवान्के प्रसादभूत चरणामृत आदि वैष्णवोंको बाँटे। वैष्णवजनोंको चाहिये कि वे बाजे बजाकर भगवान्के सामने नृत्य करें और सभी लोग बारी-बारीसे भगवान्को झुलायें। सुरेश्वरि ! पृथ्वीपर जो-जो तीर्थ और क्षेत्र हैं, वे सभी उस दिन भगवान्का दर्शन करने आते हैं—ऐसा जानकर यह महान् उत्सव अवश्य करना चाहिये।
पार्वती ! वैशाख मासकी पूर्णिमाके दिन वैष्णव पुरुष भक्ति, उत्साह और प्रसन्नताके साथ जगदीश्वर भगवान्को जलमें पधराकर उनकी पूजा करे अथवा एकादशी तिथिको अत्यन्त हर्षमें भरकर गीत, वाद्य तथा नृत्यके साथ यह पुण्यमय महोत्सव करे। भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी लीला-कथाका गान करते हुए ही यह शुभ उत्सव रचाना उचित है। उस समय भगवान्से प्रार्थना-पूर्वक कहे—'हे देवेश्वर ! इस जलमें शयन कीजिये।' जो लोग वर्षाकालके आरम्भमें भगवान् जनार्दनको जलमें शयन कराते हैं, उन्हें कभी नरककी ज्वालामें नहीं तपना पड़ता। देवेश्वरि ! सोने, चाँदी, ताँबे अथवा मिट्टीके बर्तनमें श्रीविष्णुको शयन कराना उचित है। पहले उस बर्तनमें शीतल एवं सुगन्धित जल रखकर विद्वान् पुरुष उस जलके भीतर श्रीविष्णुको स्थापित करे। गोपाल या श्रीराम नामक मूर्तिकी स्थापना करे अथवा शालग्रामशिलाको ही स्थापित करे या और ही कोई प्रतिमा जलमें रखे। उससे होनेवाले पुण्यका अन्त नहीं है। देवि ! इस पृथ्वीपर जबतक पर्वत, लोक और सूर्यकी किरणें विद्यमान हैं, तबतक उसके कुलमें कोई नरकगामी नहीं होता। अतः ज्येष्ठ मासमें श्रीहरिको जलमें पधराकर उनकी पूजा करनी चाहिये। इससे मनुष्य प्रलय-कालतक निष्पाप बना रहता है। ज्येष्ठ और आषाढ़के समय तुलसीदलसे वासित शीतल जलमें भगवान् धरणीधरकी पूजा करे। जो लोग. ज्येष्ठ और आषाढ़ मासमें नाना प्रकारके पुष्पोंसे जलमें स्थित श्रीकेशवकी पूजा करते हैं, वे यम-यातनासे छुटकारा पा जाते हैं। भगवान् विष्णु जलके प्रेमी हैं, उन्हें जल बहुत ही प्रिय है; इसीलिये वे जलमें शयन करते हैं। अतः गर्मीके मौसममें विशेषरूपसे जलमें स्थापित करके ही श्रीहरिका पूजन करना चाहिये। जो शालग्रामशिलाको जलमें विराजमान करके परम भक्तिके साथ उसकी पूजा करता है, वह अपने कुलको पवित्र करनेवाला होता है। पार्वती ! सूर्यके मिथुन और कर्कराशिपर स्थित होनेके