भारतकोश
पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 144

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यंतरण दिया गया है:

पद्मावत। १४३ दो० मिल जो प्रीतम बिछुरहि, काया अगिन जराय । कैसु मिलै तन तप बुझै, कै अब मोहि बुझाय ॥ सुनि के बात सखी सब हँसीं । जानहुँ रयनि तरैँ परगँसी ॥ अब सो चांद गगन महँ छिपा । लाल चकै कित पावस तर्पा ॥ हमहुँ न जाने धौं सो कहां। कर खोज औ बिनवबँ तहां ॥ औ अस कहब आहि परदेशी । कर मार्या हत्या जन लेशी ॥ पीर तुम्हार सुनत भा छोहू । देव मनाय होय अस ओह ॥ तूँ योगी तप कर मन जीता । योगिहि कौन राज की कथा ॥ वह रानी जहँवाँ सुख राजू । बारह अभरण करै सो साजू ॥ दो० योगी ह्वै आसन कर, इस्थिर धरम न ठांव । जो न सुने तौ अब सुनि, बारह अभरण नांव ॥ प्रथमहि मज्जन होय शरीरू । पुनि पहिरै तन चंदन चीरू ॥ साज मांग शिर सेंदुर सारा । पुनि ललाट रचि तिलक सँवारा ॥ पुनि अंजन दोउ नयनहि करे । पुनि सो कानन कुण्डल पहरे ॥ पुनि नासक झल फूल अमोला । पुनि रातौ मुख खाय तमोला ॥ गयें अभरण पहिरे जहँ ताई । औ पहिरे कर कँगन कलाई ॥ कटि क्षुद्रावल अभरण पूरा । पांयन पहिरे पायलें चूरा ॥ बारह अभरण यही बखाने । ते पहिरे बारहूँ अस्थाने ॥ दो० पुनि सोरहों शिंगार जस, चारहुँ योग कुलीन । दीर्घ चार चार लघु, चार शुभैं चहुँखीन ॥ पद्मावत जो सँवारी लीन्हा । पून्यो रात दई शशिकरीन्हा ॥

पाद-टिप्पणी (शब्दार्थ): १ बदन १ रात २ छोटे नखत ३ खिलना ४ आसमान ५ योगी ६ अर्ज़ करना ७ मेहरवानी ८-६ जेवर १० मज़बूत ११ क़ायम १२ पहिले १३ नहाना १४ लाल १५ गरदन १६ हाथ १७ कमर १८ करधनी १६ पांजेब वा छुड़े २० बड़े २१ छोटे २२ मोटे २३ पतला २४ पूरनमासी २५ ॥