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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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१४८ पद्मावत । पवनबांधै अपसबैहिं अकासा। मंसहिं जहांजाहिं तहँ वासा॥ येही आंति सृष्टि बहु छरी। यही भेष रावण सियँ हरी॥ भँवरहिं मीचै नेर जो आवा। केतकि वास लेयकहँ धावा॥ दीपक ज्योति देखिउजियारी। आय पंख ह्वै परा भिखारी॥ दो० र्यनिजोदेखें चन्दमुख, मँसि तनहोयअलोपं । तुहूँ योग अस भूला, होय राजा के रूप॥ अनधनं तूशशेरं निशें माहां। हों दिनेरं जेहिके तूद्याहां॥ चांदहि कहां ज्योति औ कला। सूर्यकीज्योतिचांद निरमलोँ॥ भँवर बास चम्पा नहिं लेई। मालति जहां तहां जिव देई॥ तुमहुत भयों पतंगकी फिरौं। सिंहलद्वीप आय उड़परा॥ सेयों महादेव कर वारूं। तजौं अन्न भा पवनअहारू॥ तुम सों प्रीतिगांठ मैं जोरी। कटै न काटै छुटै न छोरी॥ सियँ भीख रावणकहँ दीन्ही। तूअसनिठुरअन्तरपँटँदीन्ही॥ दो० रंगतुम्हारे रात्योँ, चढ़यों गगने है सूरं । जहँशशिशीतलकहँतपों, मनइच्छा धनपूर॥ योगि भिखारकरेसि बहुवाता। कहेसि रंग देखों तुहि रातौँ॥ कपरा रँगे रंग नहिं होई। हिये औट उपजै रँगसोई॥ चांदकी रंग सूर्य जो राता। देखी जगत साँझ परभाताँ॥ दग्धै विरह नितहोय अँग़ारू। दहक आंच दग्धै संसारू॥ जो मँजीठ औटै बहु आंचा। सो रंग जन्म न डोलै रांचा॥ जरै विरह जो दीपक बाती। भीतर जरि ऊपर है राती॥ सांसरोकिकै १ छिपना २ दुनियां ३ सीताजी ४ मौत ५ रात ६-११ सियाही ७ ग़ायब ८ ऐपश्रावंत ६ चाँद १० सूर्य १२-२० पांकसाफ़ १३ मानिन्द १४ दरवाज़ा १५ छोड़ना १६ श्रीसीताजी १७ ओट १८ आसमान १६ लाल २१ दिल २२ मोर २३ जलाना २४ ॥