पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ पद्मावत । रची सारे दोनों इक पासा। द्वै युग युग आवहिं कैलासा॥ पिय धन गहि दीन्ही गलबाहां। धन विछुड़ी लागी उरमाहां॥ ते छक रस नव केल करेहीं। चोक लाय अधरन रस लेहीं॥ धनै नवसात सात औ पाँचा। पूरुष दश तेरह किम बांचा॥ लीन्ह बिधांसे विरह धनसाजा। औ सबरचन जीतह तराजा॥ दो० जनहुँ औटकै मिलगये, तस दोनों भये एक। कंचन कसत कसौटी, हाथ न कोऊ टेकँ॥ चतुर नारि चित अधिकै चहूँटी। जहां प्रेम बाढ़ी किम छूटी॥ कुरला काम कीरै मनुहारी। कुरला जहँतहँ सोनसुनारी॥ कुरला होय कंतकेरै तोखू। कुरला गहै पांव धन मोखू॥ तेहि कुरलौं सो सुहाग अभागी। चंदन जैस श्यामकंठ लागी॥ गेंद गोंदकै जानहुँ लिये। गेंद चाहि धनकोमलै भये॥ दाड़िम दाखें बेलरस चाखा। पियके खेल धन जीवन राखा॥ भयो बसन्तकली मुख खोली। बैन सुहावन कोकिल बोली॥ दो० पिउ पिउ करत जीभ धन सूखी, बोली चातुर्क भांति। परीसो बूँद सीप जनु मोती, हियँ पेरी सुख शांति॥ भयो जूझ जस रावण रामा। सेज बिधांसे विरह संग्रामौ॥ लीन्ह लंक कंचन गढ़ँ टूटा। कीन्ह शिंगार अहा सब लूटा॥ औ योबन मेमन्तै बिधांसा। बिचला विरहजीव लै नासा॥ १ चौपड़ १ होंठ चूसना २ पद्मावतहारी ३ राजा जीता ४ लूटना ५ सोना ६ पकड़ना ७ बहुत ८ मस्ती में काम का तोता आया ६ जोश में सोना सुनार के हाथ से आया १० गलवा किया आचिन्दने ११ गलचा करके पैर औरतका वास्ते फ़रागतके पकड़ा १२ गलचा १३ जैसे गेंदेने गोंद के फूल को गोद में लिया १४ गेंदासे नर्म १५ अनार १६ अंगूर १७ आवाज़ १८ पपीहा १६ दिल २० लूटना २१ लड़ाई २२ कमर २३ सोने का क़िला तथा चदन २४ मस्त २५ ॥