भारतकोश
पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 161

१६० पद्मावत। सात रंग सो चित्रं चितेरे। भरके दीठं जाहिं नहिं हेरे॥ चन्दनोताँ जो खरदुकें भारी। बांसपूरै झिलमिलंकी सारी॥ दो० पुनि अभरणँ बहु काढ़ा, आनोभांति जुड़ाउ। फेरफेर सब पहिरहिं, जैस जैस मन भाउ॥ रतनसेन गये अपनी सभा। बैठे पाटैं जहां अठ खंभा॥ आयमिले चितौर के साथी। सबै विहँसके दीन्हा हाथी॥ राजांकर भल मानहु आई। जें हमकहँयह भूमि दिखाई॥ जो हम कहँ नहिं एतनरेसू। तब हम कहां कहां यहि देशू॥ धनि राजा तुइँ राज विशेखा। जेहिकीरजायसुसबकुछदेखा॥ भोग बिलास सभी कुछ पांवा। कहां जीभ तस अस्तुतिआवा॥ अब तुमआयअन्तरपटसाजा। दरशन कहँ न तपावहु राजा॥ दो० नयनें सेराने भूखगइ, देख दरश तुम आज। आजभयो अवतोरँ नव, औसव भे नये काज॥ हँसके राज रजायसुँ दीन्हा। मैं दरशन कारणें तप कीन्हा॥ अपनी योग लाग अस खेला। गुरुभा आप कीन्ह तुम चेला॥ अहकमोर बर्षारितु देखहु। गुरु चीन्ह के योग्य विशेपहु॥ जो तुम तपसाधा मोहिं लागी। अब जन हिये १६ होहु वैराँगी॥ जोजेहिं लाग सहै तप योगू। सो तेहिके सँग मानै भोगू॥ सोरह सहसँ पद्मिनी मांगी। सबै दीन्ह नहिं काहू खाँगी॥ सबके धौरहरं सोने साजा। सब अपने अपने घर राजा॥ दो० हस्तिं घोर औकापर, सबहि दीन्ह बड़ साज। तसवीर १ निगाह २ क़िस्म लहँगा ३-४ नाम कपड़ा ५-६ ज़ेवर ७ तख़्त ८ ज़मीन ६ राजा १० आंख ठंडी ११ नई पैदाइश १२ हुक्म १३ वास्ते १४ तथा रीना १५ दिल १६ दुखी १७ हज़ार १८ कमी १९ महल २० हाथी २१॥