पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 176, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपद्मावत। १७५ रतनसेन की मा सरस्वती। गोपिचन्द जस मैनावती ॥ अँधरी बूढ़ी सुठि दुख रोवा। यौवनै रतन कहां होय खोवा ॥ यौवनै अहा लीन्ह सो काढी। भइ बिन टेकें करै को ठाढी ॥ बिन यौबन भइ आश पराई। कहां सुपूत खम्भ होय आई ॥ नयन दृष्टि नहिं दिया बराहीं। घर अँधियार पूत जो नाहीं ॥ कोरी चला श्रवण की ठाउँ। टेक देह वह टेकों पाउँ ॥ तुम श्रवण द्वै काँवर सजी। डार लाय सो काहे वर्जी ॥ दो० श्रवण श्रवणके रुसई, माता काँवर लाग। तुम बिन पानि न पावै, दशरथ लावै आग॥ लै सुसंदेश विहंगम चला। उठी आग सगरी सिंहला ॥ बिरह विजारग बीज को ठेगा। धूमें सो उठी श्यामै भये मेघा ॥ भरिगा गगन लूक तस छूटी। ह्वै सो नखत गिरहिं भुइँ टूटी ॥ जहाँ जहाँ भूमि जरी भा रेहू। विरहकि दग्धै भई जनु खेहू ॥ राहु केत जस लंका जरी। औ उड़ चिनग चांदमहँ परी ॥ जाय विहंगम समुद्र डफारौ। जरे मच्छ पानी भा खारा ॥ दौंढ़ी बन बीहड़ जल सीपा। जाय नेरभा सिंहल दीपा ॥ दो० समुद्र तीर इक तरवर, जाय बैठ तेहि रुख। जबलग कहि न सँदेशा, तबलग प्यास न भूख॥ रतनसेन वन करत अहेरा। कीन्ह वही तरवर तरि फेरा ॥ शीतल वृक्ष समुद्र के तीरा। अति उतंग औ छांह गंभीरा ॥ १ जवानी १-२ बेसहारे ३ निगाह ४ नाम ब्राह्मण जो अंधी अन्धा मा बाप को काँवर में लिये रहताथा ५ छोड़ना ६ राजा दशरथ ७ नाम चिड़िया ८-१६ जहाँ विरहकी विजुली वहाँ विजुली क्या दुश्मनी करै ६ धुवाँ १० काला ११ आसमान १२ ज़मीन १३ जलना १४ राख १५ चिनगाना १७ जलाना १८ पेड़ १६ शिकार २० ऊँचा २१॥