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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 177

१७६ पद्मावत । तुरी बांधिके बैठि अकेला । साथी और करहिं सब केला ॥ देखत फिरै सो तरवर शाखा । लाग सुनै पंखिनकी भाखा ॥ पंखिनमहँ जो बिहंगम अहा । नागमती जासों दुख कहा ॥ पूँछहिं सबै बिहंगम नामा । अहो मीत काहे तुम श्यामा ॥ कहेसि मीत मासिकदुई भये । जम्बूद्वीप तहां हम गये ॥ दो० नगर एक हम देखा, गढ़ चितोर वह नाउँ । सो दुखकहूँ कहांलग, हम दाँढ़े तेहि ठाउँ ॥ योगी है निसरा सो राजा । सूननगरजानहु धुन्दैवाजा ॥ नागमती है ताकर रानी । जरै विरह जस कोयल वानी ॥ अबलग जरभइ होयहै छाराँ । कही न जाय विरहकी झाराँ ॥ हियों फाट वह जबहीं कुहके । परै आंशु सब होय होयलूके ॥ चहूँखण्ड छिटकी वह आगी । धर्ती जरत गगनेकहँ लागी ॥ विरह दवानैं को जरतबुझावा । चहूँ लाग सोहेरें धावा ॥ हौं पुनि तहां सो दाढ़े लागा । तनभा श्याम जीव लैभागा ॥ दो० कातुम हँसो गर्व के, करहु समुद्रमहँ केल । मतिअन्हबिरहीवशपरहिं, दहिअंगिनजलमेल॥ सुनि चितोर राजैं मन गुना । बिधि संदेश मैं कासों सुना ॥ को तरवरेँ पर पंखी बेशा । नागमती कर कहै संदेसा ॥ को तुम मीत मन चेतबसेरू । देव कि दानव पवन पखेरू ॥ रुदै ब्रह्म शिव बाचा तोहीं । सो निजवातअन्त कहुमोहीं ॥ कहो सो नागमती तुइ देखी । कहेसिबिरहजस मरोंविशेखी ॥ घोड़ा १ नामचिड़िया २ दोस्त ३ दोमहीना ४ जलना ५ जगह ६ अंधियारा ७ राख ८ लूक ९ छाती १० आसमान ११ आग १२ रारूर १३ पेड़ १४ महादेवजी १५ ॥