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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

DevanagariAwadhipublished318 पृष्ठ

१७६ पद्मावत । तुरी बांधिके बैठि अकेला । साथी और करहिं सब केला ॥ देखत फिरै सो तरवर शाखा । लाग सुनै पंखिनकी भाखा ॥ पंखिनमहँ जो बिहंगम अहा । नागमती जासों दुख कहा ॥ पूँछहिं सबै बिहंगम नामा । अहो मीत काहे तुम श्यामा ॥ कहेसि मीत मासिकदुई भये । जम्बूद्वीप तहां हम गये ॥ दो० नगर एक हम देखा, गढ़ चितोर वह नाउँ । सो दुखकहूँ कहांलग, हम दाँढ़े तेहि ठाउँ ॥ योगी है निसरा सो राजा । सूननगरजानहु धुन्दैवाजा ॥ नागमती है ताकर रानी । जरै विरह जस कोयल वानी ॥ अबलग जरभइ होयहै छाराँ । कही न जाय विरहकी झाराँ ॥ हियों फाट वह जबहीं कुहके । परै आंशु सब होय होयलूके ॥ चहूँखण्ड छिटकी वह आगी । धर्ती जरत गगनेकहँ लागी ॥ विरह दवानैं को जरतबुझावा । चहूँ लाग सोहेरें धावा ॥ हौं पुनि तहां सो दाढ़े लागा । तनभा श्याम जीव लैभागा ॥ दो० कातुम हँसो गर्व के, करहु समुद्रमहँ केल । मतिअन्हबिरहीवशपरहिं, दहिअंगिनजलमेल॥ सुनि चितोर राजैं मन गुना । बिधि संदेश मैं कासों सुना ॥ को तरवरेँ पर पंखी बेशा । नागमती कर कहै संदेसा ॥ को तुम मीत मन चेतबसेरू । देव कि दानव पवन पखेरू ॥ रुदै ब्रह्म शिव बाचा तोहीं । सो निजवातअन्त कहुमोहीं ॥ कहो सो नागमती तुइ देखी । कहेसिबिरहजस मरोंविशेखी ॥ घोड़ा १ नामचिड़िया २ दोस्त ३ दोमहीना ४ जलना ५ जगह ६ अंधियारा ७ राख ८ लूक ९ छाती १० आसमान ११ आग १२ रारूर १३ पेड़ १४ महादेवजी १५ ॥

पद्मावत १७७ हौं राजा सोई ओ योगी। जेहिकारण वह ऐसो वियोगी ॥ जस तू पंखी^१ हौं दिन भरौं। चाहों कबहिं जाय उड़ परौं ॥ दो० पलक आंख तेहिमारेगैं^२, लागीडुनहुरहाहिं । कोउ न सँदेशी आवहिं, तेहिक सँदेश कहाहिं ॥ पूँछहि कहा सँदेश वियोगू^३। योगी भया न जानहि भोगू ॥ धर्नी संग न संगे पूरे। पानी बूड रात दिन झूरे ॥ तेल बैल जस बायें फिरे। परै भँवर महँ सौहें^४ न टरे ॥ तुरी^५ नाउँ दाहिन रथ हांका। बायें फिरै कुम्हार का चाका ॥ तुहिअस नाहिं जो पंख भुलाना। उड़ै सो आव जगतमहँ जाना॥ एक दीप का आयों तोरे। सब संसार पांयतर मोरे ॥ दहने फिरै सो अस उजियारा। जस जग चांद सूर्य्य औ तारा ॥ दो० मुहसँदबायेंदिशँ^६ तजी, एकश्रवणैं^७ इकआंख। जबते दाहिन होय मिला, बोल पपीहा पांख ॥ हौं ध्रुव अंचल सो दाहिनलावा। फिर सुमेरुँ^६ चितोरगढ़ आवा॥ देखों तोरे मँदिर घमोई। मात तोर आंधर भई रोई ॥ जस श्रवणैं बिन अन्धी अन्धा। तस रुरुमुई तोहिं चितबन्धा ॥ कहेसि मरों को कांवर लेइ। पूत नाहिं पानी को देइ ॥ गई प्यास लाग तुहि साथा। पानी देह दशरथ के हाथा ॥ पानी न पिये आग पै चाहा। तोहिअस पूत जन्म अस लाहा॥ भागीरथी^१२ होहु कर फेरा। जाय सँवारि मरन की बेरा ॥ दो० तू सपूत मन ताकर, अस परदेश न लेहि। अबताईं मुइ होयही, मुयहिं जाय कत देहिं॥

  • दुखी १ जानवरपरिन्द २ राह ३ दुख ४ सामने ५ घोड़ा ६ तरफ़ ७ कान ८ नामसितारा ६ पहाड़ १० नाम-मातापिताभक्त ११ गंगाज़ी १२ ॥

१७८ पद्मावत । नागमती दुख बिरह अपारा । धर्ती स्वर्ग जरै तेहिं झारा ॥ नगरकोट घर बाहेर सूना । न्योजे १ होय घरपुरुषबहूनां ॥ तू कामरूं परा बश टोना । भूला योग छरा तोहि घेना ॥ वह तुहिं कारन मरुभइ मारा । रही नाकहोय पवन अधारा ॥ कहुँ बोलहिं लै मोकहँ खाहू । मांस न कायाँ जो रुच काहू ॥ बिरह मयूरें नाग वह नारी । तू मँजारै कर वेगि गुहारी ॥ मांस गिरा मांजर है परी । योगी अबहुँ पहुँच लै जरी ॥ दो० देख बिरह दुख ताकर, मैं सो तर्जा बनबास । आयोंभाग समुद्र महँ, तोह न छांड़े पास ॥ अस पुनि जरा बिरहकरगठां । मेघश्याम भये धूम जो उठा ॥ दाढ़ों राहु केतु गा दाधा । सूरज जरा चांद जर आधा ॥ औ सब नखत तँराईं जरीं । टूटहिं लूक धर्ति महँ परीं ॥ जरै सो धर्त्ती ठावहिं ठाउँ । दहक पलाशैं जरे तेहिं दाउँ ॥ बिरह श्वासतंस निकसीझारा । दहिदहि परवतहोहिंअंगारा ॥ भँवर पतंग जरै औ नागा । कोकिलभुजयल औवनकागा ॥ बन पंखी सब जिवलै उड़े । जल पक्षी जलमहँ दुख बुड़े ॥ दो० हमहुँ जरत तहँ निकसा, समुद बुझायों आय । समुद्र जरा पनिभा खारा, धूमरहा जग छाय ॥ राजैं कहा रे स्वर्ग सँदेशी । उतरखाव मोहिं मिलपरदेशी ॥ पांयटेक तहिं लावों हियरे १४ । परम संदेश कहो है नियरे ॥ कहा बिहंगमैं जो बनबासी । कितक गृहीते होहि उदासी ॥ परमेश्वर न करे १ खाली २ बदन ३ मोर ४ बिल्ली ५ जल्द ६ मदद ७ बूटी ८ छोड़ना ९ ढेर १० जलना ११ छोटेनखत १२ दाख १३ दिल १४ नामाचिड़िया १५ ॥

जेहितरु१ तरितुअासन कोऊ । कोकिल काग बराबर दोऊ ॥ धर्त्ती महँ विष चारा परा। हारलै जानि भूमिपरिहरा ॥ फिरौं वियोगी डारहि डारा। करौं चले कहँ पंख सँवारा ॥ जहवां घरी घंटत नित जाहीं। सांझ जीवहै दिवसहि नाहीं॥ दो० जो लहि फेरे मुकै है, परों न पिंजरमाह । जाउँ वेगथल अपने, है जेहिबीच निबाह ॥ कहि संदेश विहंगम चला । आग लाय सगरे सिंहला ॥ घड़ी वीत राजा घर आवा । भायलोपैपुनिदृष्टिन आवा ॥ पंखी नाउँ न देखा पांखू । राजा रोय फिराके साखू ॥ जस हेरत वह पंख हेराना । दिनकहमहिंअसकरवपयानाँ॥ जोलहिप्राणपिंड इकठाँऊँ। एकबार चितोरगढ़ जाऊँ ॥ आवाभँवर मंदिर जहँ केवौं । जीव साथ लेगयो परेवों ॥ तन सिंहल मन चितोर वसा । जिव वेसँभरनागिनजिमडसा॥ दो० जेतनारि हँस पूँछी, अमीवचन जिमि निन्त । रसउतरा विष चढ़रहा, नावहि चिन्तन मिन्त ॥ वरस एक तहँ सिंहलरही । भोग विलास कीन्हजसतही ॥ भा उदास जो सुना सँदेशू । सँवरिचला मन चितोर देशू ॥ कमल उदासी देखा भँवरा । थिरै नरही मालतिमन सँवरा ॥ योगी औ मन पवन परावा । कित थिररहै जोचित्तउचाहा ॥ जो जिव काढ्देआवन कोई । योगी भँवर न आपन होई ॥ चलाकमलमालँतिहिर्ये घाली। अवकितथिरआली अलँआली॥ पेड़ १ यह चिड़िया पेड़ नहीं छोड़ती पानी पीने में भी लकड़ी पंजे में लिये रहतीहै २ ज़मीनछोड़ी ३ दिन ४ नजात ५ नाम चिड़िया ६ गायब ७ निगाह ८ देखना ६ कूच १० वदन ११ जगह १२ कमल तथा पद्मावत १३ जानवर परिन्द १४ मीठी बात १५क़ायम १६ तथा पद्मावत १७ दिल १८ भँवर १९॥

१८० पद्मावत। गन्ध्रबसेन आय सुनि बारो। कस जिव भयो उदास तुम्हारा॥ दो० मैं तुमहीं जिवलावा, दीन नयनमहँ वास। जो तुम होहु उदासी, यहिका कर कैलास॥ रतनसेन विनवा कर जोरी। अस्तुति योग जीभि नामोरी॥ सहसै जीभ जो होहिं गुसाई। कीन जाय अस्तुति जहँताई॥ कांच किरा तुम कञ्चन कीन्हा। तब भारतन ज्योति तुम्ह दीन्हा॥ गंगजो निरमलै नीरै कुलीना। नार मिले जल होय मलीना॥ तसहों अहा मलीनी कला। मिला आय तुम भानिसमलाँ॥ पान समुद्र मिला होय सोती। पापहरा निरमल भइज्योती॥ तुम भन आवा सिंहलपुरी। तुमते चढ़ा राज औ कुँरी॥ दो० सात समुद्र तुम राजा, सरनै पांव कोउखोट। सबैयाय शिर नावहिं, जहां तुम्हारा पोंट॥ औ मोबिनयै अबकरों गुसाईं। तबल ग कयों जीव तवताईं॥ आवा आज हमार परेवौं। पाती दीन्ह आन पति देवा॥ राज काज औ भुइँ उपराहीं। शत्रु भाय अस कोऊ नाहीं॥ आपन आपन करहिं सुलीकौं। एकहि मार एकचहि टीका॥ भई अमावस नखतहि राजू। हमकहँ चन्द चला वह आजू॥ राज हमार जहां चलिआवा। लिखिपठई अब होय परावा॥ वहॉनेर देहली सुलतानू। होयहै ओर उठै जो भानू॥ दो० रहहु अमर्र महि गगनै लग, औजोलह हमआव। शीशैं हमारा तहां नितें, जहां तुम्हारा पांव॥ दरवाजा १ हज़ार २ सोना ३ पाकसाफ़ ४-७ पानी ५ बेरोशनी ६ सोता ८ साफ़ ६ इज़्ज़त १० बराबर नहीं कोई ११ तख्त १२ अर्ज़ करना १३ बदन १४ क़ासिद १५ दुश्मन १६ हद १७ सूर्य १८ हमेशा ज़िन्दा १६ ज़मीन आसमान २० शिर २१ हमेशा २२॥

राजसभा पुनि उठी सँवारी । अस बिनती राखी पत भारी ॥ भाइन मांझ होय जन फूटी । घरके भेद लंक अस टूटी ॥ बिरवा लाय न सूखने दीजै । पावै पान दृष्टि सो कीजै ॥ अस राखी तुम दीपक लेसी । पै न रहै पाहुन परदेसी ॥ जाकर राज जहां चलि आवा । वही देश पै ताकहँ भावा ॥ हम दोउ नयन घाल के रखहिं । ऐसो भाख यहि जीभ न भाखहिं ॥ दिवस देहुँ सकुशल सिधावहिं । दीर्घआयु होय पुनि आवहिं ॥ दो० सबहिं विचार परा अस, भा गवने कर साज । सिद्ध गणेश मनावहिं, विधि पूरवे मन काज ॥ बिनयै करै पद्मावत बारी । हों पिय कमलसों गोद नेवारी ॥ मोहिं अस कहां सो मालति बेली । कदम सेवती चम्प चँबेली ॥ औ श्रृंगार हार जस तागा । पुहुप कली अस हिरदयँ लागा ॥ हों सुबसन्त करों नित पूजा । कुसुम गुलाल सुदरशन गूजा ॥ बकचन बिनवों रोस बिमोही । सुनि बकाव तज जाही जूही ॥ नागेसर जो मन है तोरी । पूज न सके बोलसर मोरी ॥ हों सदवर्ग लीन्ह मैं शरना । आगे कर जो कन्त तुहिकरना ॥ दो० केतेनारि समुझावै, भँवर न काटै बेध । कहै मरौं पै चित्तोर, यज्ञ करों अश्वमेध ॥ गवन चार पद्मावत सुना । उठा धसक जिव औ शिर धुना ॥ गहवर आय नयन भर आंसू । छांड़व यहि सिंहल कैलाशु ॥ छांड़यो नैहर चल्यों बिछोही । यहरे दिवसँ होहूँ तहँ रोई ॥ छांड़यों आपन सखी सहेली । दूरगवन तज चल्यों अकेली ॥

  • निगाह १ दिन क़रार दो २ बड़ी उमर हो ३ ईश्वर ४ अर्ज़ करना ५ फूल ६ छाती ७ तारीफ़ सुनि गुस्सा नहीं आता ८ तथा नागमती ६ तथा राजा १० अलग ११ दिन १२ ॥

१८२ पद्मावत । जहां न रहन भयो निज चालू । होत हि कस न तहां भा कालू ॥ नैहर आय काहि सुख देखा । जनु है गयो स्वपन कर लेखा ॥ राखत पार सो पिता निछोहों । कित विवाह के दीन्ह विछोहों ॥ दो० हिये ३ आय दुख बाजों, जिव जानहु गाछेक । मन तेवान के रोवै, हर मँडार कर टेकें ॥ पुनि पद्मावत सखी बोलाई । सुनि के गवन मिलीं सब आई ॥ मिलहु सखी हम तहँवां जाहीं । जहां जाय पुनि आवन नाहीं ॥ सात समुद्र पार वह देशू । कित रे मिलन कित आव सँदेशू ॥ अगम पंथ परदेश सिधारी । न जनो कुशल कि विथाँ हमारी ॥ पितौ नेछोहैं कीन्ह हियँ माहां । तहँ को हम राखै गहि बाहां ॥ हम तुम एक मिले सँग खेला । अन्त विछोहें आन गेयें मेला ॥ तुम अस हितू सँगात पियारा । जियत जीव नहिं करौं निरारों ॥ दो० कन्त चलाई का करौं, आयसु जाय न मेट । पुनि हम मिलहिं कि ना मिलैं, लेहु सहेली भेट ॥ धनिं रोवंत रोईं सब सखी । हम तुम देख आप कहँ झखी ॥ तुम ऐसी जहँ रही न पाहीं । पुनि हम काहि जो आहि पराहिं ॥ आदि पितौ जो रहा हमारा । वहूँ न यहि दिन हिये विचार ॥ छोहूँ न कीन्ह निछोहों ओहूं । का हम दोष लगाइक गोहूँ ॥ मँकुँ गोहूँ कर हिया चरानों । पै सो पिता न हिये छोहानों ॥ औ हम देखा सखी सरेखे । यहि नैहर पाहुन कर लेखे ॥ तब तेंहि पिय नैहर ना चाहा । जेहि ससुरार अधिक होय लाहा ॥ बेदर्द १ जुदाई २-१० दिल ३ पहुँचा ४ ईश्वर का नाम, ले ठीक करके ५ मुश्किल राह ६ दुख सुख का हाल ७ बेमेहरी ८ दिल ६-१६ गरदन में डाला ११ अलग १२ हुक्म १३ पद्मावत १४ आदम १५ मेहरवानी १७ बेदर्दी १८ पाप १६ शायद २० छाती फटी २१ मेहरवान २२ बहुत फ़ायदा २३ ॥

पद्मावत । १८३ दो० चालनकहँ हम अवतरी, चलन सिखात हँ आय । अब सो चलन चलावै, को राखै गहिपायँ ॥ तुम बारी पिय सोर के राजा । गर्ब क्रोध वोही पै छाजा ॥ सब फल फूल वही की शाखा। चहै सो तोड़े चहै सो राखा ॥ आयसु लहे रहो नित हाथा। सेवा करहु लाय भुइँ माथा ॥ बर पीपर शिरउभै जो कीन्हा । पाकर तिन सूखी फर दीन्हा ॥ बंवर बोड़ शीश भुइँ लावा । बड़फल सुफर वही पै पावा ॥ आँव जो फरके नवै तराहीं । तब अमृतभा सब उपराहीं ॥ सोइ पियारी पियाहिँ पिरीती । रहै जो आयसुँ सेवा जीती ॥ दो० पोथीकाढ़ गवन दिन देखे, कौने दिन है चाल । दिशाशूल औ वक्रयोगिनी, सौहंन चलिये काल॥ अदिते शुक्रपश्चिमदिश राहू । बेफै दक्षिण लंकदिशे दाहू ॥ सोमैँ शनीचर पूरुब न चालू । मंगर बुद्ध उत्तरदिश कालू ॥ आवशैं चला चहै जो कोई । औषधि कहूँ रोग नहिं होई ॥ मङ्गल चलत मेल मुखधनियां। चलै सोम देखें दरपनियां ॥ शुकहिं चलत मेल मुखराई। बेफै चलै दक्षिण गुड़ खाई ॥ अदित तंबोल मेल मुखगुण्डी। बायबरंग शनीचर खण्डी ॥ बुधदधि किये चलहुभोजना । औषधि यहि न आनखोजना॥ दो० अवसुनि चक्र योगिनी, ते भुइँ थिरै न रहाहिं । तीसोदिनँ सचन्द्रमा, आठो दिशा फिराहिं ॥ बारह उनइस चार सताइस । योगिनपच्छमदिशा गिनाइस॥ पैदा १ पैरपकड़के २ राजाभोज ३ गुरूर ४ हुक्म ५-६ बलन्द ६ कद ७ शिर ८ सामने १० इतवार ११ उत्तर तरफ़ १२ सोमवार १३ ज़रूरत १४ दही १५ क़ायम १६ दिन १७ ॥

१८४ पद्मावत । नौ सोरह चौबिस औ एका । पूरब दश्विन कोन तेहि टेका ॥ तीनइ ग्यारह छबिस अठारा । योगिन दश्विनदिशा विचारा ॥ दुइ पचीस सत्रह औ दसा । दक्षिण पश्चिमकोन विचार्यवसा ॥ तेइस तीस आठ पन्द्रहां । योगिन होहि पूर्व सामहां ॥ चौदह बाइस उनइस सात । योगिन उतरदिशा कहँजात ॥ बीस अठाइस तेरह पांच । उत्तर पश्चिमकोन तहँबांच ॥ दो० इकइस औ छह योगिनि, उतर पूरब के कोन । यह गुनचक्रयोगिनी, बांच जो चहे सिधिहोन ॥ परिवा नवें पूर्व परं भायें । दूइज दसमी उतर अदाँये ॥ तीज एकादश अगनू मौरी । चौथ दुवादश नैऋत वौरी ॥ पंचमी तेरस दक्षिण रमेश्वरी । छठचौदश पश्चिमपरमेश्वरी ॥ सतमी पून्यो वायब आँहिँ । अठै अमावस इशान लाँहिँ ॥ तिथि नक्षत्र गुरुबार कहीजे । सुदिन साध प्रस्थान धरीजे ॥ सगुन दुघड़ियागिन साधना । भद्रा औ दिशाशूल वांचना ॥ वक्र योगिनी गिने जो जाने । परवर जीत लच्छ घर आने ॥ दो० सुखसमाध आनन्दघर, कीन्ह पयानां पीव । थरथरात तन काँपे, धर्क धर्क जाय जीव ॥ मेष सिंह धन पूरब बैसी । वृष कन्या मकर यम दिसी ३२ ॥ मिथुन तुला औकुम्भपछौहां । कर्कमीन विश्चिक उतरोंहां ॥ गवन करे कहँ उँगैरै कोई । सनमुखसोमे लाभैवहु होई ॥ परेवा और नवमी को पूरुव जाना मना १ दुइज दशमी उत्तर मना २ तिथि ३-११ आग्नेयमना ३ तिथि ४-१२ नैऋत्यमना ४ तिथि ५-१३ दक्षिण बुरा ५ तिथि ६-१४ पश्चिममना ६ तिथि ७-१५ वायव्यमना ७ तिथि८-३० ईशानमना ८ दिन अच्छा ६ कूच १० मेष सिंह धन पूरब अच्छा ११ वृप कन्या मकर उत्तर अच्छा १२ मिथुन तुला कुम्म पश्चिम अच्छा १३ कर्क मीन वृश्चिक उत्तर अच्छा १४ निकलना १५ चांद १६ फ़ायदा १७ ॥

पद्मावत । १८५ दहिन चन्द्रमा सुख सरबदा । बायें चन्द्रायत दुख आपदा ॥ अदिते होय उत्तर कहँ कालू । सोमकाल बायब नहिं चालू ॥ भूमि कालपच्छमबुधनैऋता । गुरै दक्षिनशुकअग्नेयता ॥ पूरब काल शनीचर बसे । पीठ दे काल चले सब हँसे ॥ दो० धन नक्षत्र औ चन्द्रमा, औ ताराबल सोय । समय एक दिन गवने, लक्ष्मी केतक होय ॥ पहिले चाँद पूर्व दिश तारा । दूजे बसे इर्शन बिचारा ॥ तीजे उत्तर सो चौथे बायब । पँचैसोपश्चिमदिशगिनायब ॥ छठयें नैऋत दक्षिण सतैं । बसे जाय अग्नेय सो अठैं ॥ नवें चन्द्र जो पृथ्वी बासा । दशयें चन्द्र जो रहै अकासा ॥ ग्यारें चन्द्र पूर्व फिर जाय । बहुकलेश में दिवससँवायें ॥ अशुनैं भरनैं रेवती भली । मृगशिरैं मूलैं पुनरबसैं बली ॥ पुष्यैं जेठैं हस्तैं अनुराधौ । जो सुख चाहै पूजे साधा ॥ दो० तिथ नक्षत्र औ बार इक, अष्टसातखण्ड भाग । आदिश्रन्तैं बुधसो यह, दुखसुखअंकमलाग ॥ परेवाछठ एकादश नन्दा । दुइजसप्तमी द्वादश मन्दा ॥ तीज अष्टमी तेरस जयाँ । चौथचतुरदश नौमीरिक्याँ ॥ पूरन पूनों दशमी पाँचैं । शुक्रे नन्दे बुध भा नाचैं ॥ अदितसोहस्तनखतसिधिलैंहिये।बीफेपुष्येश्रवणशशिकहिये॥ भरणि रेवती बुध अनुराधा । भई अमावस रोहिणी साधा ॥ इतवार १ मंगल २ बीफे ३ नवमीको चांदका बास ज़मीन पर ४ दिन बीते ५ नाम नक्षत्र ६-७-८-९-१०-११-१२-१३-१४-१५ सातों मुल्क १६ अव्वलसे आख़िर तक खुशी १७ परेवा छठ एकादशी सफ़र करना अच्छा १८ दुइज सप्तमी द्वादशी बुराहै १६ तीज अष्टमी तेरस जीत २० चौथ चतुर्दशी नवमी में देरी २१ पूर्णमासी दशमी पंचमी अच्छा २२ खुशी २३ इतवार को हस्तनक्षत्र अच्छा २४ नामनक्षत्र २५-२६-२७ ॥

१८४ पद्मावत । राहु चन्द्र भूमि संपति आये । चन्द्रग्रहण तब लाग संजाये ॥ सुनि काजग आज्ञा लीजे । सिद्धि योग गुरपरवा कीजे ॥ दो० जेहि नक्षत्रहोय रवि, वही अमावस होय । वीचि परेवा जब मिले, सूर्यग्रहण तब होय ॥ चलहुचलहु भा पियँकरचालू । घड़ी न देखलेत जिवकालू ॥ समुदलोक धर्न चढ़ी वेवाना । जोदिनडरे सो आयतुलानाँ ॥ रोवहिं मात पिता औ भाई । कोउ न टेकै जो कंत चलाई ॥ रोवहिं सब नैहर सिंहला । लै बजाय के राजा चला ॥ तजाँ राज रावनका गयो । छांड़ा लंक विभीषण लियो ॥ फिरी सखी भेंट तज फेरा । अन्त कन्त सो भयो गुरेराँ ॥ कोइ काहू का नाहिं नियानों । मया मोह बांधा उरमानो ॥ दो० कञ्चनकायों नाँरिकी, रही न तोला मांस । कन्त कसौटी घालके, चूरौं गढ़ै कि हांस ॥ जो पहुँचाय फिरा सब कोऊ । चलासाथगुनअवगुनँ दोऊ ॥ औ सँगचला गवन सबसाजा । वही दई अस पारेराजा ॥ डोली सहस चलीसँग चेरी । सबै पद्मिनी सिंहल केरी ॥ भल पटोरे खर वार सँवारी । लाख चारइक भरी पेटारी ॥ रतनपदारथ माणिक मोती । काढ़ भंडार दीन्ह रथजोती ॥ परख सो रतन पारखेंहि कहा । इकइकनग सृष्टिबरँ लहा ॥ सहस पांति तुरयनँ की चली । औसौपांति हस्ति सिंहली ॥ ज़मीन १ श्वास का विचार २ सूर्य ३ रत्नसेन ४ मौत ५ पद्मावत ६ पहुँचा ७ रोकना ८ छोड़ना ६ मुलाकात १० आखिर ११ सोने की तरह बदन १२ पद्मावत १३ नाम जेवर १४ पाप और पुण्य १५ ईश्वर पार ल- गावै १६ हज़ार डोली लौंडी १७ कपड़ा १८ छात १६ हीरा जवाहर २० जौहरी २१ सारी दुनिया की क़ीमत २२ हज़ार क़तार घोड़ा २३ हाथी २४॥

पद्मावत । १८७ दो० लिखनी लाग जो लेखा, कहे न पारहिं जोर। अर्ब खर्ब औ नीलशंख, साहस पदम करोर ॥ देख दर्व राजा गर्बानौ । दृष्टि मांहि कोइ और न आनौ ॥ जो मैं होब समुद्र के पारा । को है मोहिं जगत संसारा ॥ दर्व गर्व लोभ विष मूरी। दत्ते न रहे सत्ते हो दूरी ॥ दत्त सत्य पै दोनों भाई। दत्त न रहै सत्य पुनि जाई ॥ जहां लोभ तहँ पाप सँघाती । संचै मरै आनकी थाती ॥ सिद्धं दर्व आगके थापा । कोई जरा जार कोइ तापा ॥ काहू चांद काहुभा राहू । काहू अमृत विष भा काहू ॥ दो० तस भूला मन राजा, लोभ पाप अँधकूप। आय समुद्र ठाढभा, है दानी के रूप ॥ वोहितं भरी चला लै रानी। दान मांग संंतदेखी दानी ॥ लोभ न कीजे दीजे दानू। दानहि पुण्यहोय कल्यानू ॥ दर्व दान देई विधि कहा। दान मोक्ष है दुख नहिं रहा ॥ दान आहि सब द्रव्यकि जँरू। दान लाभ है बाँचै मूरू ॥ दान करै रक्षा मँझ नीरा। दान गहे लै लावै तीरा ॥ दान करन दै दुइ जगतरा। रावन सँचौ अगिनिमहँजरा ॥ दानमेरु बड़ लाग अकांराँ। सेंतैं कुबेर बूड मँझधारा ॥ दो० चालिस अंश द्रव्य जहँ, एक अंश तहँ मोर। नाहिंत जरै कि बूडै, की निशँ मूसहिं चोर ॥ सुनि सुदान राजै रिसमानी। कै वोरायस बौरे दानी ॥ गरूर किया १ निगाह २ बराबर ३ देना ४ सचाई ५ जोड़ना ६ साधू ७ अन्धाकुवां ८ नाव ६ दान देनेवाला १० भलाई ११ ईश्वर १२ नजात १३ न्योछावर १४ असिल जमा १५ पानी में वंचावै १६ नाम राजा १७ जोड़ना १८ नाम पहाड़ १६ आसमान २० जमा करना २१ रात २२॥

१८८ पद्मावत । सोई पुरुष द्रव्य जो सैंतैं । द्रव्यहुतें सुनि बातैं ऐतैं ॥ द्रव्य ते गर्व्व करै जो चाहा । द्रव्यते धर्ती स्वर्ग निवाहा ॥ द्रव्य ते हाथ आव कैलासू । द्रव्यते अपसर छांड़ न पासू ॥ द्रव्यते निरगुन हो गुनवत्ता । द्रव्य ते कुब्जरूपे रूपवन्ता ॥ द्रव्य रहै भुइँ दिपै लिलारौँ । अस मन द्रव्य हिये को पारा ॥ द्रव्य ते धर्म कर्म औ राजा । द्रव्यते सुद्धिबुद्धि बलकाजा ॥ दो० कहा समुद्र रे लोभी, बड़ी द्रव्य नहिं झांप । भयो न काहू आपन, मूँद पिटौरी सांप ॥ आधे समुद्र आय सो नाहीं । उठी वायु आंधी उपराहीं ॥ लहरें उठीं समुद्र उलथानोँ । भूला पंथै स्वर्ग नियराना ॥ अदिन आय जो पहुँचे काहू । पहनँ उड़ाय वहैं सो वाऊ ॥ बोहित भई लंकादिश ताकी । मारगें छांड़ कुमारग हांकी ॥ जो लै भार निवाहन पारों । सो का गर्व्व करै कन्धारों ॥ द्रव्य भार सँग काहि न ऊठा । जैं सैंतौ ताही सों रूठा ॥ गहि पखानै लै पंख न ऊड़ा । मोर मोरजें कीन्ह सो वूड़ा ॥ दो० द्रव्य जो जानहि अपना, भूलाहिं गर्व में नाहिं । जेरि उठाय न लैसकहिं, बूड़ चलहिं जलमाहिं ॥ केवर्ट एक बिभीषण केरा । आव मच्छकर करत अहेरौँ ॥ लंकाकर अति राखस कारा । आवै चला होय अँधियारा ॥ पांच सूड़ दश बाहीं ताही । धड़भाश्याम लंक जवदौही ॥ धुवां उठै मुख श्वाससँघातां । निकसै आग कहै जो बाता ॥ गरूर १ बदसूरत २ माथा ३ उलटना ४ राह ५ बुरेदिन ६ पत्थर ७-१५ नाव ८ लंका की तरफ़ ६ राह १० जयतक होसका ११ गरूर १२ मल्लाह १३ जोड़ना १४ मल्लाह १६ शिकार १७ काला १८ जलना १६ श्वासके साथ२०॥

पद्मावत। १८६ फेकरे मूँड़ चँवर जनु लाये। निकस दांत मुख बाहेर आये॥ देह रीछकी रीछ डेराई। देखत दृष्टि धाय जनु खाई॥ रातेनयन निडर जो आवा। देख भयावन सब डरखावा॥ दो० धर्ती पाँयँ स्वर्ग शिर, जानु सहस्राबाहु। चांद सूर्य औ नखतम्हँ, अस देखेजनुराहु॥ वोहितँ वही न मानहि खेवा। राक्षंस देखि हँसा जनु देवा॥ बहुते दिनहिबारै भइ दूजी। अजगरकेर आय मुखपूंजी॥ यहि पद्मिनी विभीषण पावा। जानहु आज अयोध्याछावा॥ जानहु रावन पाई सीता। लंका बसी राम रन जीता॥ मच्छ देख जैसें बकँ आवा। टोयटोय सुइँ पांव उठावा॥ आय नेर होय कीन्ह जोहारू। पूँछा क्षेम कुशल व्योहारू॥ जो विश्वासघात का देवा। बड़ विश्वास करैकी सेवा॥ दो० कहां मीत तुम भूलेहू, औ जायहु केहि घाट। हों तुम्हार अस सेवक, लाय देउँ तुहिं बाँटे॥ गाँढ़ परे जिव बावर होई। जो भल बात कहै भल सोई॥ राजैं राक्षस नेर बोलावा। आगे कीन्ह पन्थ जनु पावा॥ बहुवंसोवै राक्षसकहँ बोला। पैगटेकें भूमि सब डोला॥ तू खेवकैं खेवक उपराहीं। वोहितँ तीरलाव गहिबाहीं॥ तुहितें तीर घाट जो पाऊँ। नौगिरही तोडर पहिराऊँ॥ कुण्डल श्रवणँ देउँ नग लाई। महराकी सौंपों महराई॥ तस राक्षस तोर पूरों आसा। राक्षसाइन की रहै न बासा॥ निगाह १ लाल आंख २ नाम राजा जिसके हज़ार हाथ थे ३ नाव ४ खुशहुआ ५ पेट भरा ६ बगुला ७ खैरियत ८ दग़ाबाज़ ६ यक़ीन १० राह ११—१३ दुःख १२ ख़ुशी १४ खड़ाहूआ १५ ज़मीन १६। मल्लाह १७ नाव १८ नाम ज़ेवर १६ कान २० ॥

१६० पद्मावत। दो० राजैं बीड़ा दीन्हों, नहिं जानों बिश्वासै। इक अपनी भूखकारनै, होय मच्छकर दास॥ राक्षस कहा गुसांइ बिनाती। भल सेवक राक्षसकी जाती॥ छीना लंकदही श्रीरामा। सेवन छोड़ देह भइ श्यार्मा॥ अबहूँ सेवकरे सँग लागे। मानुष भूल होहिं नहिं आगे॥ सेतबन्धराघव जहँ बांधा। तेहिते चढ़ो भारै लें कांधा॥ पै अब तुरत दान कुछ पाऊँ। तुरतगही बहँ बांध चढ़ाऊँ॥ तुरंत जो दान पान हँस दीजे। थोरा दान बहुत पुनि कीजे॥ सेवक राय जो दीजे दानू। दान नाहिं सेवाँ बर मानू॥ दो० दै बाचौं सत ना रहा, हत निरमल जेहिरूप। आंधी बहुत उड़ायके, मारगयो अन्धकूप॥ जहां समुद्र मँझधारँ भँडारू। फिरै पानि पाताल दुआरू॥ फिरफिर पानि वही ठांवमरै। फेर न निकसै जो तहँ परै॥ वही ठांव महिरावन पुरी। हलकातर यमकातेरं चूरी॥ वही ठांव महिरावन मारा। परे हाड़ जनु पड़े पहारा॥ परी रीढ़ जेहि ताकर पीठी। सेतबन्ध अस आवै दीठी॥ राक्षस आन तहां के जुड़े। बोहित भँवर चक्र महँ पड़े॥ फिरे लाग बोहित जस आई। जस कुम्हार घर चाक फिराई॥ दो० राजै कहा रे राक्षस, जान बूझ बौरास। सेतबन्ध यह देखें, कसैनतहां लैजास॥ सुनिबावर राक्षस तब हँसा। जानहु स्वर्ग टूटिभुइँगसा॥ . एतवार १ भूखवास्ते २ जलाना ३ काला ४ बोझ लै जासक्ता ५ ख़िद- मत ६ ख़िदमत का हक़ ७ क़ौल ८ बीचोबीच ९ यमफांस १० पुल ११ नाव १२ आसमान १३॥

को बावर तुम वौरहि देखा । जो बावर मुख लागि सरेखा ॥ बावर तुम जो मूखे कहँआनी । तोहिन सभभी पंथंभुलानी ॥ पंख जो बावर रहि घर माटी । जीभ चढ़ाय भखै सब आँटी ॥ महिरावन की रीर जो परी । कहो सी सेतुबन्ध बुधि हरी ॥ यहि सो आहि महिरावनपूरी । जहँवां स्वर्ग नेर घर दुरी ॥ अब पछताव द्रव्य जस जोरा । करहु स्वर्ग पर हाथ मरोरा ॥ दो० जोहि जियत महिरावन, लेत जगतकर भार । जो मरहाड़ न लैगा, अस होय परा पहार ॥ बोहितें भवहिं भवै सब पानी । नाचैं राक्षस आशतुलोनी ॥ बूडहिं हस्ति घोर मानंवाँ । चहुँदिश आयजुरे मँसखंवा ॥ ततखन राजपंख एकआवां । शिखंर टूटजसडहनेडुलावां ॥ परांदृष्टि वह राक्षस खोटा । ताकेसिजैसुहस्तिं बड़मोटा ॥ आय वही राक्षस पर टूटा । भैंहिलेउड़ा भँवरजल छूटा ॥ बोहितें टूक टूक सब भई । ऐसो न जाना वह कहँ गई ॥ भये राजा रानी दुइ पाटा । दोनों बहे चले दुइ बाटाँ ॥ दो० कार्यों जीव मिलायके, मारकियो दुइ खण्ड । तन रोवत धरतीचला, जीव चला ब्रह्मण्ड ॥ मूरछ परी पद्मावत रानी । कहँजिव कहँपिव ऐस न जानी ॥ जानु चित्र मूरति गहि लाई । पाटा परी बही तस जाई ॥ जन्मत पवन सही सुकवारा । तेहिसो परादुखसमुद्र अपारा ॥ लक्ष्मी माय समुद्र की बेटी । ताकहँ लच्छ होय जें भेटी ॥ भूख के पास आये १ राह २ चींटी ३ नाव ४ उम्मेद पूरी हुई ५ हाथी ६-१३ आदमी ७ तुरंत ८ सौमुगी ६ पहाड़ १०. बाजू ११ निगाह १२ पकड़ना १४ नाव १५ राह १६ बदन १७ आसमान १८ तसवीर १६ दौलत २० ॥

१६२ पद्मावत । खेलत रही सहेली सेती। पाटाजाय लाग तेहि रेती॥ कहेसि सहेली देखो पाटा। मूरतिआय लागि वहि घाटा॥ जो देखहिं त्रिया है श्वासा। फूलमुवां पै मुई न बासा॥ दो० रंग जो राँती प्रेमकी, जानहु वीरबहूट। आयबही दधि समुद्रमें, पै रंग गयो नछूट॥ लक्ष्मी लक्षण बतीसों लखी। कहेसि न मरी सँभारहु सखी॥ कागद पतिरी जैसो शरीरा। पवन उड़ाय परीं मँझनीरों॥ लहरझकोरउड़हिंजलभीजा। तौह रूप रंग नहिं छीजौ॥ आप शीश लै बैठी कोरों। पवनडुलावे सखि चहुँओरा॥ यास्की समुझ परा तन जीउ। मांगेसि पानि बोल कै पीउ॥ पानि पियाय सखी मुखधोई। पद्मिनजान कमलसँग कोई॥ तब लक्ष्मी दुख पूँछ मिलोही। त्रिया समुझ बात कहु मोही॥ दो० देख रूप तोर आगर, लाग रहा चितमोर। केहिनगरी की नागर, काहि नाउँ धनतोर॥ नयन पसार चेत धर्न चेती। देखी काह समुद्रकी रेती॥ आपन कोउ न देखेसि तहां। पूँछेसि को तुम को हम कहां॥ अहैजो सखी कमलसँगकोई१०। सानाहीं मोहिंकहाविछोई११॥ कहांजगत मन पिया पियारा। जससुमेरु विधि१२ गरुसँवारा॥ ताकर गरबी प्रीति अपारा। चढ़ेहिये१४ जनु चढ़े पहारा॥ रहै न गरवी प्रीतिसो झांपी। कैसे जियों भार दुख चांपी॥ कमलंकरी की जोरी नाँहौं। दीन्हबहायउदधि जलमाँहा॥ • सुरझाना १ लाल २ सब गुन जाननेवाली ३ पानी में ४ नुक़सान ५ शिर ६ गोद ७ कोकावेली ८-१० पद्मावत ९ अलग ११ पहाड़ १२ ईश्वर १३ दिल १४ खाविन्द १५ समुद्र १६॥

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पद्मावत। १६३ दो० आवा पवन बिछोहको, पातिपरा बिकरार। तरवरं तजी जो चूरकै, लागै केहिकी डार॥ कहनिन जानहिं हमतोर पीउ। हम तू पाइरहा नहिं जीउ॥ पाटा परी आय तू बही। ऐसोन जानहिंथों कहँ अहही॥ तब सुधि पद्मावत मन भई। सँवरि बिछोहैं मुरछमर गई॥ नयनहिं रक्त सुराही ढारो। जनहु रक्त शिरकाट पियारा॥ खनेहिं चेत खनहो बिकरारा। भा चन्दनबन्दन सबछारा॥ बावर होय सो परी पुनि पाटा। देहु बहाय कन्त जेहि घाटा॥ को मोहिं आग देय रच होरी। जियत न बिछुड़ै सारसजोरी॥ दो० जेहिसर मार बिछोगा, देहु वही शिर आग। लोग कहैं यहि सर चढ़ी, हों सो जरों पिय लाग॥ कायाँ उदधि चितों पिय पाहां। देखौंरतन सो हिरदय माहां॥ जनहु आहि दरपन मम हिया। तेहि महँ बैठि देखावे पिया॥ नयननीरे भीजत मुठ दूरी। अब तेहि लाग मरोंसुठ भूरी॥ पिय हिरदयमहँ भेंट न होई। कोरे मिलाव कहौं केहि रोई॥ श्वास पास नित आवै जाई। सो न संदेश कहै मोहिं आई॥ नयन कौड़िया भइ मँडराहीं। थिरक सार पै आवहि नाहीं॥ मन भँवरी वह कमल बसेरी। है मरजिया न आये हेरी॥ दो० साथी आये नियाथ जो, सके न साथ निबाहि। जो जिय जारे पिय मिले, भेंटरे जिय जर जाहि॥ सती होय कहँ शीर्ष उघारी। घने महँ बीजे घाव जिमियारी॥ १ अलग १-३ पेड़ २ जानवर जिबहकर छोड़ दिया ४ कसी ५ राख ६ चिता ७ बदन ८ समुद्र ९ दिल १० आँसू ११ मुलाकात १२ जो माल के साथी थे १३ शिर १४ बादल १५ बिजुली १६ ॥

१६४ पद्मावत । सेंदुर जरै आग जनु लाई । शिरकी आग सँभार न जाई ॥ छूट मांग सब मोति परोई । बारहिंवार गिरहिं जनु रोई ॥ टूटहिं मोति बिछोहैं के भरे । श्रावण बूँद गिरहिं जनु झरे ॥ फेर फेर कर यौबनै करा । जानहु कनक आगिन महँ जरा ॥ अगिन मांग पै देइ न कोई । पाहुनै पवनैपान सम होई ॥ खीनलंक टूटी दुख भरी । बिनरावनैं केहिवरं होयखरी ॥ दो० रोवत पंख विमोही, जनु कोकिला अरम्भं । जाकर कनक लुटासो, विछुड़ी प्रीतम खम्भ ॥ लक्ष्मी लाग बुझावै जीव । नामर बहिन मिलाहि तोरपीव ॥ पियो पानि होव पवन अधारी । जस हौं तुह समुद्र की वारी ॥ मैं तोंहि लाग लेत पटबाट् । खोजव पितै जहांगलघाटू ॥ हौं जेहि मिलौं ताहिं बड़भागू । राज पाट औ देउँ सुहागू ॥ कहि बुझाय के मंदिर सिधारी । भइज्योनार न जेवै नारी ॥ जेहिरे कन्तकर होय बिछोवौ । कातेहि नींद भूख सुखसोवा ॥ जीव हमार पीव लें आहा । दरशन देव लेव चितचाहा ॥ दो० लक्ष्मी जाय समुद्र पहँ, ये बातैं सब चाल । कहा समुद्र अहे घटमोरे, आन मिलावों काल ॥ राजा जाय तहां बहि लागा । जहां न कोइ संदेशी कागा ॥ तहां एक परबंत हा धूँगा । जहवां सब कपूर औ मूँगा ॥ तहँ चढ़ हेरौं कोइ न साथा । दर्व्यसमेटकुछ लाग न हाथा ॥ रहा जो रावण केर बसेरौ । गोहराये कोइ मिले न हेरा ॥ विरह १ जवानी २ सोना ३ महिमान ४ हवा पानी देते हैं ५ पतली कमर ६ तथा राजा रतनसेन ७ ताक़त ८ मोहजाना ९ बेक़रार १० सोना ११ लड़की १२ याप १३ पद्मावत १४ जुदाई १५ ऊँचा पहाड़ १६ देखना १७ मकान १८ ॥

पद्मावत । १६५ डाढ़ मारके राजा रोवा। कैं चितौरगढ़ राज बिछोवा ॥ कहां मोर सब द्रव्य भंडारू। कहां मोर सब कटककँधारू ॥ कहां तुरंगै मोर बांकावली। कहां मोर हस्ति सिंहली ॥ दो० कहँ रानी पद्मावत, जीव बसे जेहि माहिं। मोर मोर के खोयों मूल, गर्वऔगाहिं ॥ चम्पा भँवरा गुरु जो मिलावा। मांगे राजा बेगि न पावा ॥ पद्मिनि चाह जहां सुन पाऊँ। परों आग औ पानि धसाऊँ॥ ढूंढ़ों पर्वत मेरु पहारा। चढ़ों स्वर्ग औ परों पतारा ॥ कहां सो गुरु पाऊँ उपदेशी। अगमपन्थ कर होय संदेशी ॥ पर्यो आय यह समुद्र अथाहा। जहां न वार न पार न थाहा ॥ सीता हरण राम संग्रामा। हनुमत मिला जिता तब रामा॥ मोहिंन कोइ विनवौं केंहि रोई। को सहाय उपदेशिक होई ॥ दो० भँवर जो पावै कमल कहँ, मन आनंद बहुतकेल । आयपरा कोइ हस्ति तहँ, चूरकिये सो बेल ॥ कासों पुकारौं कापहँ जाऊँ। गाढ़ै मीत होय तेहि ठाऊँ ॥ को यह समुद्र मथे बल बाढ़ा। को मंथ रतन पदारथ काढ़ा ॥ कहां सो ब्रह्मा विष्णु महेषू। कहां सुमेरु कहां वह शेषू ॥ कोचस साज देइ मोहिंआनी। वासुकि दाम सुमेरु मथानी ॥ को दधिसमुद्र मथै जस मथा। करनी सार न कहिये कथा ॥ जौलहि मथन कोइ दै जीवा। सूधी अंगुरि न निकसै घीव ॥ लै नग मोर समुद्र भा बया। गाढ़ परै तौ लै परगटा ॥


पाद-टिप्पणियाँ (Footnotes): अलग १ फ़ौजभारी २ घोड़ा ३ हाथी ४ गरूरगहिरा ५ जल्द ६ वीहड़ ७ आसमान ८ राह बतानेवाला ९ मुश्किलराह १० मिन्नत ११ दुख १२ हाथी १३ पियारादोस्त १४ जगह १५ महादेवजी १६ पहाड़ १७-२० नामराजासाँपोंका १८ रस्सी १६ ॥