पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 191, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० पद्मावत। दो० राजैं बीड़ा दीन्हों, नहिं जानों बिश्वासै। इक अपनी भूखकारनै, होय मच्छकर दास॥ राक्षस कहा गुसांइ बिनाती। भल सेवक राक्षसकी जाती॥ छीना लंकदही श्रीरामा। सेवन छोड़ देह भइ श्यार्मा॥ अबहूँ सेवकरे सँग लागे। मानुष भूल होहिं नहिं आगे॥ सेतबन्धराघव जहँ बांधा। तेहिते चढ़ो भारै लें कांधा॥ पै अब तुरत दान कुछ पाऊँ। तुरतगही बहँ बांध चढ़ाऊँ॥ तुरंत जो दान पान हँस दीजे। थोरा दान बहुत पुनि कीजे॥ सेवक राय जो दीजे दानू। दान नाहिं सेवाँ बर मानू॥ दो० दै बाचौं सत ना रहा, हत निरमल जेहिरूप। आंधी बहुत उड़ायके, मारगयो अन्धकूप॥ जहां समुद्र मँझधारँ भँडारू। फिरै पानि पाताल दुआरू॥ फिरफिर पानि वही ठांवमरै। फेर न निकसै जो तहँ परै॥ वही ठांव महिरावन पुरी। हलकातर यमकातेरं चूरी॥ वही ठांव महिरावन मारा। परे हाड़ जनु पड़े पहारा॥ परी रीढ़ जेहि ताकर पीठी। सेतबन्ध अस आवै दीठी॥ राक्षस आन तहां के जुड़े। बोहित भँवर चक्र महँ पड़े॥ फिरे लाग बोहित जस आई। जस कुम्हार घर चाक फिराई॥ दो० राजै कहा रे राक्षस, जान बूझ बौरास। सेतबन्ध यह देखें, कसैनतहां लैजास॥ सुनिबावर राक्षस तब हँसा। जानहु स्वर्ग टूटिभुइँगसा॥ . एतवार १ भूखवास्ते २ जलाना ३ काला ४ बोझ लै जासक्ता ५ ख़िद- मत ६ ख़िदमत का हक़ ७ क़ौल ८ बीचोबीच ९ यमफांस १० पुल ११ नाव १२ आसमान १३॥