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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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१६२ पद्मावत । खेलत रही सहेली सेती। पाटाजाय लाग तेहि रेती॥ कहेसि सहेली देखो पाटा। मूरतिआय लागि वहि घाटा॥ जो देखहिं त्रिया है श्वासा। फूलमुवां पै मुई न बासा॥ दो० रंग जो राँती प्रेमकी, जानहु वीरबहूट। आयबही दधि समुद्रमें, पै रंग गयो नछूट॥ लक्ष्मी लक्षण बतीसों लखी। कहेसि न मरी सँभारहु सखी॥ कागद पतिरी जैसो शरीरा। पवन उड़ाय परीं मँझनीरों॥ लहरझकोरउड़हिंजलभीजा। तौह रूप रंग नहिं छीजौ॥ आप शीश लै बैठी कोरों। पवनडुलावे सखि चहुँओरा॥ यास्की समुझ परा तन जीउ। मांगेसि पानि बोल कै पीउ॥ पानि पियाय सखी मुखधोई। पद्मिनजान कमलसँग कोई॥ तब लक्ष्मी दुख पूँछ मिलोही। त्रिया समुझ बात कहु मोही॥ दो० देख रूप तोर आगर, लाग रहा चितमोर। केहिनगरी की नागर, काहि नाउँ धनतोर॥ नयन पसार चेत धर्न चेती। देखी काह समुद्रकी रेती॥ आपन कोउ न देखेसि तहां। पूँछेसि को तुम को हम कहां॥ अहैजो सखी कमलसँगकोई१०। सानाहीं मोहिंकहाविछोई११॥ कहांजगत मन पिया पियारा। जससुमेरु विधि१२ गरुसँवारा॥ ताकर गरबी प्रीति अपारा। चढ़ेहिये१४ जनु चढ़े पहारा॥ रहै न गरवी प्रीतिसो झांपी। कैसे जियों भार दुख चांपी॥ कमलंकरी की जोरी नाँहौं। दीन्हबहायउदधि जलमाँहा॥ • सुरझाना १ लाल २ सब गुन जाननेवाली ३ पानी में ४ नुक़सान ५ शिर ६ गोद ७ कोकावेली ८-१० पद्मावत ९ अलग ११ पहाड़ १२ ईश्वर १३ दिल १४ खाविन्द १५ समुद्र १६॥