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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 194

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पद्मावत। १६३ दो० आवा पवन बिछोहको, पातिपरा बिकरार। तरवरं तजी जो चूरकै, लागै केहिकी डार॥ कहनिन जानहिं हमतोर पीउ। हम तू पाइरहा नहिं जीउ॥ पाटा परी आय तू बही। ऐसोन जानहिंथों कहँ अहही॥ तब सुधि पद्मावत मन भई। सँवरि बिछोहैं मुरछमर गई॥ नयनहिं रक्त सुराही ढारो। जनहु रक्त शिरकाट पियारा॥ खनेहिं चेत खनहो बिकरारा। भा चन्दनबन्दन सबछारा॥ बावर होय सो परी पुनि पाटा। देहु बहाय कन्त जेहि घाटा॥ को मोहिं आग देय रच होरी। जियत न बिछुड़ै सारसजोरी॥ दो० जेहिसर मार बिछोगा, देहु वही शिर आग। लोग कहैं यहि सर चढ़ी, हों सो जरों पिय लाग॥ कायाँ उदधि चितों पिय पाहां। देखौंरतन सो हिरदय माहां॥ जनहु आहि दरपन मम हिया। तेहि महँ बैठि देखावे पिया॥ नयननीरे भीजत मुठ दूरी। अब तेहि लाग मरोंसुठ भूरी॥ पिय हिरदयमहँ भेंट न होई। कोरे मिलाव कहौं केहि रोई॥ श्वास पास नित आवै जाई। सो न संदेश कहै मोहिं आई॥ नयन कौड़िया भइ मँडराहीं। थिरक सार पै आवहि नाहीं॥ मन भँवरी वह कमल बसेरी। है मरजिया न आये हेरी॥ दो० साथी आये नियाथ जो, सके न साथ निबाहि। जो जिय जारे पिय मिले, भेंटरे जिय जर जाहि॥ सती होय कहँ शीर्ष उघारी। घने महँ बीजे घाव जिमियारी॥ १ अलग १-३ पेड़ २ जानवर जिबहकर छोड़ दिया ४ कसी ५ राख ६ चिता ७ बदन ८ समुद्र ९ दिल १० आँसू ११ मुलाकात १२ जो माल के साथी थे १३ शिर १४ बादल १५ बिजुली १६ ॥

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