पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० पद्मावत। गन्ध्रबसेन आय सुनि बारो। कस जिव भयो उदास तुम्हारा॥ दो० मैं तुमहीं जिवलावा, दीन नयनमहँ वास। जो तुम होहु उदासी, यहिका कर कैलास॥ रतनसेन विनवा कर जोरी। अस्तुति योग जीभि नामोरी॥ सहसै जीभ जो होहिं गुसाई। कीन जाय अस्तुति जहँताई॥ कांच किरा तुम कञ्चन कीन्हा। तब भारतन ज्योति तुम्ह दीन्हा॥ गंगजो निरमलै नीरै कुलीना। नार मिले जल होय मलीना॥ तसहों अहा मलीनी कला। मिला आय तुम भानिसमलाँ॥ पान समुद्र मिला होय सोती। पापहरा निरमल भइज्योती॥ तुम भन आवा सिंहलपुरी। तुमते चढ़ा राज औ कुँरी॥ दो० सात समुद्र तुम राजा, सरनै पांव कोउखोट। सबैयाय शिर नावहिं, जहां तुम्हारा पोंट॥ औ मोबिनयै अबकरों गुसाईं। तबल ग कयों जीव तवताईं॥ आवा आज हमार परेवौं। पाती दीन्ह आन पति देवा॥ राज काज औ भुइँ उपराहीं। शत्रु भाय अस कोऊ नाहीं॥ आपन आपन करहिं सुलीकौं। एकहि मार एकचहि टीका॥ भई अमावस नखतहि राजू। हमकहँ चन्द चला वह आजू॥ राज हमार जहां चलिआवा। लिखिपठई अब होय परावा॥ वहॉनेर देहली सुलतानू। होयहै ओर उठै जो भानू॥ दो० रहहु अमर्र महि गगनै लग, औजोलह हमआव। शीशैं हमारा तहां नितें, जहां तुम्हारा पांव॥ दरवाजा १ हज़ार २ सोना ३ पाकसाफ़ ४-७ पानी ५ बेरोशनी ६ सोता ८ साफ़ ६ इज़्ज़त १० बराबर नहीं कोई ११ तख्त १२ अर्ज़ करना १३ बदन १४ क़ासिद १५ दुश्मन १६ हद १७ सूर्य १८ हमेशा ज़िन्दा १६ ज़मीन आसमान २० शिर २१ हमेशा २२॥