पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब लखमी गइ पिताँ के ठाऊँ। जो यहिकर सबचूड़सो पाऊँ॥ तब सो जरी अमृत लै आवा। जोमरहतैसोछिड़कजियावा॥ एक एक कै दीन्ह सो आनी। भा संतोष मन राजा रानी॥ दो० आय मिले सब साथी, हिलमिलकरहिंअनन्द। भई प्राप्त सुख संपति, गयो छूट दुख धन्ध॥ और दीन्ह बहुरंतन पषानों। सोनरूपजोमनहिं न आना॥ जे बहु मोल पदार्थ नाऊँ। कातेहि बरनै कहूं तुमठाऊँ॥ तेहिकर भाव रूप को कहा। इकइक नग सृष्टि वरलहा॥ हीर फार बहु मोल जो अही। ते सब नग चुनचुनके गंही॥ जो इक रतन भुनावै कोय। करै सोई जो मनमहँ होय॥ द्रव्य गर्व मन गयो भुलाई। हेमसमलच्छमनहिंनहिंचाई॥ लघुदीर्घ जो द्रव्य बखाना। जो जेहिचही सोई तेहिमाना॥ दो० बड़ औ छोट दोउसम, स्वामिकारजी सोय। जोचाही जेहि काजकहँ, वही काज सो होय॥ खण्ड उनतीसवां समुद्र और लक्ष्मीखण्ड॥ दिन दश रही जाय पहुनाई। पुनि भइविदा समुद्रसोजाई॥ लखमी पद्मावत सो भेटी। जो सो कहा अपनी सोवेटी॥ समुद्र न दीन्ह पानकर वीरा। भरके रतनै पदारथ हीरा॥ और पांच नग दीन्ह विशेखी। श्रवणै सुनी नयननहिंदेखी॥ एक सो अमृत दूसर हंसू। औ तीसरं पंखी कर बंसू॥ चौथ दीन्ह शावकैसादूरू। पांचों परस जो कंचैनमूरू॥ वाप. १ सञ्जीवनमूर २ जो मरगये थे ३ सच ४ पत्थर ५ जवाहर. ६ रंग ७ दुनियां का मोल ८ लेना ९ गरूर १० हमारे बराबर कोई नहीं ११ छोटे बड़े १२ जवाहर १३ कान १४ शेरका बच्चा १५ सोना १६॥