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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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२६० पद्मावत । संधे सुगंधे घरे जल बाँढ़े। टेंगर्ने मुंवे टॊय सब काढ़े॥ सींग मंगोर बीन सब घरे। पतरों बहुतवांब बनगंरे॥ मारेचरैके चाहैं परहाँसी। जलतज कहां जायजलवासी॥ मनहोय मीनैं चरा सुखचारा। परा जाल को दुख निरवारा॥ माटी खाय मच्छ नहिं बाची। बाचहिं काहभोग सुखनाची॥ मारे कहँ सब अस कै पाले। को उबार तेहि सरवैरै घाले॥ दो० यहि दुख कंतहिं १६ सारकी, अगमनरक्त न देह। पंथैं भुलाय आयजलपाछे, छूटे जगत सनेह॥ देखत गोहूँ कर हिय फाटा। आनी तहां होय जेहि आटा॥ तब पीसै जब पहिले धोय। कांपर छान माड़ै भल होय॥ करलें चढ़ाहि तेहि पाकहिंपूरी। मूठी मांझ रहै सौ जोरी॥ जानहु तैसे श्वेते अरु उजरी। नयनूचाहिअधिकवहकुँदेरी॥ मुख मेलतखन जाहिं बिलाई। सहसैं स्वाद सो पावजोखाई॥ लुचई पोय पोय घिव भेई। पाछे चहन खांड़ सो जेई॥ पूरी सुहारी करे घिव चुवा। छुवत बिलायडरहिं को छुवा॥ दो० कही न जाय मिठाई, कहत मीठ सत बांत। खात अघात न कोई, हेबरै जाय सिरात॥ रींधे चावल बरन न जाहीं। बरन बरनैं सबसुगँधबसाहीं॥ रायभोगै औ काजरै रानी। झिनवाँ रुदवाँ दाउदखानी॥ कपूरे काटकंजेरी रतनौरी। मधुकरैं ढेलौं जीरौं सारी॥ क़िस्म जानवर दरियायी १ से १३ तक । मछली १४ तालाव १५ खां- विन्द न मुख डालके पहिलेसे खून बदन में नरक्खा १६ राह भूलके पानी में फंसे झूठी दुनिया की मुहब्बत में १७ रोटी १८ कराही १६ गर्म २० सफ़ेद २१ मुलायम २२ हज़ार २३ बर्फ़ २४ तरहबतरह २५ क़िस्म चावल २६ से ३६ तक॥