पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपद्मावत। २७ दो० माणिकै मोती देखावह, हिये² न ज्ञान करलेय। दाड़िमै दाखैं छांड़िकै, आंब ठौर फर लेय॥ तेतो फिरी उतर अस पावा। बिन वा सुये हिये डर खावा॥ रानी तुम जुग जुग सुख पाउ। हो अज्ञाँ वनवासकहँ जाऊ॥ मोती जो मलीन होय कला। पुनि सोपानि कहाँ निरमला॥ ठाकुर अन्त चहे जेहि मारा। तेहि सेवक कहिकहां उबारा॥ जेहि घर काल मँजारी नाचा। पंखिहि नाउँ जीव नहिंबांचा॥ मैं तुम राज बहुत सुख देखा। जो पूँछहिँ दिये जाय न लेखा॥ जो इच्छौं मन कीन्ह सुजेंवा। यह पछतावचल्यों बिनसेंवा॥ दो० मोरै सोई निसोगों, डरै न अपनी दोसें। केला अकेल करै का, जो भयो बेरै परोस॥ रानी उत्तर दीन्ह कै मयाँ। जो जिवजायरहै किमिकयाँ॥ हीरामणि तू प्राण परेवा। आखनलाग करत तेहिसेवा॥ तुहिसेवा बिछुरन नहिं आखौं। पींजर हिये घालिकै राखौं॥ हौं मानुष तू पंखे पियारा। धर्म प्रीति तहां को मारा॥ का प्रीति तनहमाँह बिलाय। सोई प्रीति जियसाथ जो जाय॥ प्रीतिभारली हिये न शोच। वही पन्थ भल होयकिं पोच॥ प्रीति पहाड़ भार जो काधा। किततेहि छूटलाय जिवबाधा॥ दो० सुआँ नरहै खुरकै जी, अबहुँ कालसो आव। शत्रै अहै जेहि करियाँ, कहूसो बूड़ा नाव॥ मोती १ दिल २-६-२०-२२ अनार ३ अंगूर ४ जवाब ५-१६ परवानगी ७ साफ़ ८ बिलार ६ जानवर परिन्दा १० हिसाव ११ जो मनने चाहा सो खाना खाया १२ बेग़म १३ पाप १४ बेरीका पेड़ १५ मेहरबानी १७ बदन १८ जानवर परिन्द १६-२१ तोता २३ अंदेशाभरा हुवा २४ दुश्मन २५ मल्लाह २६॥