पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें। पद्मावत । २८७ दो० स्याम समुद्र मोर निरमले, रतनसेन जग सेने। दूसर सरै जो कहावै, सो बिलाय जस फेन॥ पद्मिनिपुनिमसि बोल न बैनों। सों मसि देख दुहूँ तोर नयना॥ मसि श्रृंगार सब काजर बोला। मसक बुंद तिल सों हिंक पोलाँ॥ लोनाँ सोई जहां मसि रेखा। मसि पुतरिन तेहि से जग देखा॥ जो मसि घाल नयन दुहुँ लीन्हीं। सो मसि फेर जाय नहिं कीन्हीं॥ मसि मुद्रौ दुइ कुर्च उपराहीं। मसि भँवर जस कमल भंवाहीँ॥ मसि केशंहि मसि भौंह उरेहीं। मसि बिन दशन न शोभ न हिं देहीं॥ सो कस श्वेते जहाँ मसि नाहीं। सो कस पिंड़े न जहँ परछाहीं॥ दो० अस देवपाल राउ तस, छत्रधरा शिर फेर। चितौर राज बिसरगा, गयो जो कुंभले नेर॥ सुन देवपाल जो कुंभल नेरी। पंकज नयन भौंह धने फेरी॥ शत्रु मोर पिय कर देवपालू। सो कित पूच सिंह सरै भालू॥ दुखन भरा तन जे तन केशा। तेहक संदेश सुनावसि बेश्या॥ सोन नदी अस मोर पिय गरवा। पाहन होय परै जो हरवाँ॥ जेहि ऊपर अस गरुवा पीउ। सो कस डोलाये डोलै जीउ॥ फेरत नयन चीर सो छूटी। भइ कूटन कुटनी तस कूटी॥ नाक कान काटी मैंसिलाई। मूड मूड़के गदहे चढ़ाई॥ दो० मुहमद गरू जो विधि लिखी, का कोई तेहि फूँक। जेहिक भार जग थिर रहा, उड़ेन पवन के झूँक॥ पाकसाफ़ १ दुनिया का देखनेवाला २ बराबरी ३ बात ४ गाल ५ खूबसूरत ६ छाप ७ छाती ८ बाल ६ दांत १० सफ़ेद ११ वदन १२ नाम मुल्क १३ कमल १४ पद्मावत १५ दुश्मन १६ शेरकी बराबरी १७ रीड़ १८ पत्थर १६ बहिजाना २० लहँगा २१ सियाही २२ ईश्वर २३ क़ायम २४॥