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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 309

३०८ पद्मावत । संङ्गै राजा दुख उगसारों । जियत जीव नाकरों निरारों ॥ कठिनैबन्द तुर्कहिं लैगहा । जो सँवरों जिय पेट न रहा ॥ घनमँगढै ऊपर मुहिलेँ मेला । सांकर औअँधियार दुहेलाँ ॥ क्षणक्षणैं जीउसडार्सहिं आंका । औनित डोमलुछावाहिंवां का ॥ पीळे साप रहें चहुँ पासा । भोजन सोई रहे पर श्वासा ॥ पास न तहँवां दूसर कोई । नजनों पवन पानि कस होई ॥ दो० आस तुम्हारी मिलनकी, तब सो रहा जियपेट । नाहितहोत निराश जिय, कितजीवनकितभेंट ॥ तुम पिय आय परे अस बेरा । अबदुखसुनौं कमलधर्न केरा ॥ छोड़ गयो सरवेरं महँ मोहीं । सरवर सूख गयो बिनतोहीं ॥ केलिं जो करत हंस उड़गयऊ । भानुँ निपटसो वैरी भयऊ ॥ गइ तर्जे लहेरें पुरयन पाता । मुयों धूप शिर अहो न छाता ॥ भयो मीनें तन तड़पै लागा । विरह आय बैठो है कागा ॥ काग चोंचत सालैहिनौंहां । जस वँदतोर घालहियें माहां ॥ कहों काग अब तहँ लैजाही । जहँवां पिउदेखै मोहिं खाही ॥ दो० कागैं गृध्र नहिं ऐसो, गढ़ का मारे बहुमंद । यह पछतायें सठमरौं, गयों न पियसँगवंद ॥ खण्डचवालीसवां वृत्तांतदेवपाल ॥ तेहि ऊपर का कहों जो भारी । विषमै पहाड़ परादुखभारी ॥ दूती इक देवपाल पठाई । ब्राह्मण वेप छलें मोहिंआई ॥ अकेले में १ खोलना २ अलग ३ भारीकैद ४ पेचदार क़िला ५ बहुत ६ घड़ीघड़ी ७ शीशागर्म ८ पद्मावत ६ तालाब १० खुशी ११ सूर्य १२ छोड़ना १३ मछली १४ सूराख १५ खाविन्द १६ छाती १७ कौवे और गृधका दखल न था ऐसा क़िला रक्षाका था १८ टेढ़ा १६ ॥