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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 56

पद्मावत । ५५ दो० वरन शिंगार न जान्यो, नखशिख जैस अभोग । तस जग में कछू न पायों, उपमां देव वह योग ॥ मुनिके राजा गयो मुरझाय । जानो लहर सूर्य के पाय ॥ प्रेम घाव दुख जानि न कोई । जेहि लागै जानै पै सोई ॥ परा सुप्रेम समुद्र अपारा । लहरहिं लहर होय बिसआराँ ॥ विरह भँवर होय भांवर देय । खनखन जीव हिलोरहिं लेय ॥ कितहिं निसाँसँ बूड़िजिवजाइ । कितहिं उठै निसाँसै बौराइ ॥ कितहिं पतिं खन हो मुखसेताँ । कितहिंचेते खनहोयअचेताँ ॥ कठिन मरन ते प्रेम व्यवस्था । नान जिये न जाय अवस्थाँ ॥ दो० जनु लै हारहिंलीन्ह जिव, हरहिं त्राँसेहि ताहि । इतना बोल न आव मुख, करें त्राहि त्राहि ॥ जहँलग कुटुंब लोग औ नेगी । राजारायआय सब बेगी ॥ ज्ञानवन्त गुणी कारणी आये । ओझा वैद्य सयान बुलाये ॥ चरचहिं चेतै परखहिं नारी । नेरें नाहिं औषध तहिं बारी ॥ है राजा लक्ष्मण के कराँ । शक्ती बान मोह है पराँ ॥ तहँ सो राम हनुमन्त बलदौरी । को लै आव सजीवनमूरी ॥ बिनय करहिं जेतो गढ़पती । का जीव कीन्ह कौन मतमती ॥ कहोसो पियर काहि पुनि खांगा । समुद्रसुमेरु औरतुमहिंमांगा ॥ दो० धावने तहां पठावैं, देहिं लाख दशरोकें । होयसो बेल जेहिबारी, आनहिं सबै बरोकैं ॥ जो भा चेत उठा बैरागा । बावर जनो सोय उठि जागा ॥ दुनियाँ १ मिसाल २ बेकरार ३ वेदम ४-५ पीला ६ सफ़ेद ७ होश ८ बेहोश ६ हाल १० दुखदेना ११ जल्द १२-१६ चेहरेकी हालत १३ नजदीक १४ मानिन्द १५ राजा १६ दूत १७ नक़द १८ ॥