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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 58

पद्मावत। ५७ कठिनै आह सिंहलकर साजू । पाई नाहिं जो झांकै साजू ॥ वह पंथै जाय जो होय उदासी। योगी यैती औ तपी संन्यासी॥ भोग किये पायत वह भोगू । तर्ज सो भोग कोइ करतन योगू ॥ तुम राजा चाहो सुख पावा। योगहि भोग करत नहिं आवा ॥ दो० साधेन सिद्धन पाई, जोलौ साधि न तप्प । सोपै जानहिं बापुरो, शीशें जो करतहिं कल्प ॥ का भाखे कहानी कथा। निकसै घीव न बिन दधि मथा ॥ जो लह आप हेराय न कोई। तौलहि हेरत पाव न सोई ॥ प्रेम पहाड़ कठिनै बिधि १२ गढ़ा। सोपै जाय शीशें सों चढ़ा ॥ पंथै सूरि नगर उठा अँगूरू। चोर चढ़ार्क चढ़ि मंसूरू ॥ तुइँ राजा का पहिरेसि कंथा। तोरे घरहिमांझ दश पंथा ॥ कामक्रोधे तृष्णां मनमाया। पांचौ चोर न छांड़हिं कायों ॥ नव सेंध २१ गढ़े २२ के मंझियारों । घर मूसहिं निशि २३ के उजियारा॥ दो० अबहूँ जागि अयानी, होत आवनि शि२७ ओर। पुनि कुछ हाथ न लागै, मूसजायँ जब घोर ॥ सुनि सो बात राजा मन जागा। पलकन मारि टकटकालागा॥ नयनन्हिं ढरहिं मोति औ मूंगा। जस गुड़ खाय रहा है गूँगा ॥ हियें की ज्योति दीपवह सूझा । यह जो दीप अँधेरा बूझा ॥ उलटि दृष्टि ३० माया सो रूठी। पलक न फिरी जान कै झूठी॥ जो पै नाहीं इस्थिर दसा । जंग उजारि का कीजे वसा ॥ : मुश्किल १-११ लड़ाई २ राह ३ किस्मफ़क़ीर ४-५-६-७ छोड़ना ८ फ़क़ीर ६-१५ शिर १०-१३ ईश्वर १२ राहसूरीकी १४ गुदड़ी १६ बीच १७ राह तथा नाक कान आँख मुहँ गुदा लिंग १८ गुस्सा १६ हवस २० बदन २१ सूराख २२ क़िला २३ दरमियान २४ रात २५-२७ नादान २६ आंख २८ दिल २६ नज़र ३० ॥