पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ पद्मावत। सुख संकल्प दुख सांभरै लीन्हा। तौ पयान सिंहल कहँ कीन्हा॥ भँवर जानि पै कमल पिरीती। जेहि महँ बिथा प्रेम की बीती॥ औ जें समुद्र प्रेम कर देखा। तें यहिं समुद्र बूँद वर लेखा॥ सातौँ समुद्र सत लीन्ह सँभारू। जों धरती का गरु पहारू॥ जो पै जीव बांध सत बेरा। परजिव जाय फिरै नहिं फेरा॥ दो० रंगनाथ हौं जाकर, हाथ वही के नाथ। गहै नाथ सो खींचै, फिरै न फेरे माथ॥ प्रेम समुद्र जो अति अवगाहूँ। जहां न वार न पार न थाहा॥ जो वह समुद्र गाह यहिं परे। जो अवगाहँ हंस होइ तरे॥ हौं पद्मावत कर भिखमङ्गा। दृष्टि न आव समुद्र औ गङ्गा॥ जेहि कारणै मैं काँथर कंथौ। जहां सो मिलै जाउँ तेहि पंथौ॥ अब यह समुद्र परो होय मरा। प्रेम मोर पानी के करों॥ मरभा कोई कतहूँ लै जाऊँ। वहकी पंथै कोऊ घर खाऊँ॥ असमन जान समुद्र महँ पयौँ। जो कोई खाय वेगेँ निसतेरयौँ॥ दो० स्वर्ग शीश धर धरती, हियों सों प्रेम समुन्द। नयनै कौड़यौ होयरही, लै लै उठ तेहि हुन्द॥ कठिन बियोगै योग दुखदाहूँ। जन्म जरतहौं और न पाहू॥ डर लज्जा तहँ दोउ गँवानी। देखै कछू न आग न पानी॥ आग देखि वह आगें धावा। पानि देखि वह सौंहिं धसावा॥ जस बावर न बुझाये बूझा। कौन भांति जाय का सूझा॥ तोशा १ कूच २ बराबर ३ खारी, मीठा, पानी, दही, दूध, शराब, किल- किलाकृत ये सात समुद्र हैं ४ ज़मीन ५ पकड़ना ६ गहिरा ७-८ निगाह ६ वास्ते १० गरदन ११ गुदड़ी और कंठ्ठा १२ राह १३-१५ मानिंद १४ जल्द १६ छूटजाना १७ आसमान १८ शिर १६ ज़मीन २० दिल २१ आँख २२ नाम जानवर २३ मुश्किल २४ जुदाई २५ जलना २६ सामने २७ किस तरह २८ ॥