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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 68

पद्मावत । ६७ मगर मच्छ डर मने न लेखा । आपहिं चहौं पारभा देखा ॥ औ नहिं साय वह सिंहंसिंदूरी । काठै जाहि अधिकै यह झूरी ॥ कायाँ सायों सङ्गन साथी । जेहि जिव सौंपा सोई साथी ॥ दो० जो कुछ दैर्व अहा सङ्ग, दान दीन्ह संसार । काजानी केहिकी संतः दई उतारै पार ॥ धन जीवनैं औ ताकर जिया । ऊँच जगतैं महिजाकर दिया ॥ दिया सो सर्व जपतप उपर्राहीं । दिया बराबर कुछ जगं नाहीं ॥ एक दियातें दशगुन लाहा । दिया देखि सबको मुख जाहा ॥ दिया करै आगे उजियारा । जहां न दिया तहां अँधियारा ॥ दिया मंदिरे निशि करै उजोरा । दिया नाहिं घर मूसहिं चोरा ॥ हौतिम करनैं दिया जो सिखा । दिया रहा धर्मन महँ लिखा ॥ दिया सो काज दोहूँ जग आवा । यहां जो दिया वहां सब पावा ॥ दो० निरमलैं पंथै कीन्ह तेहि, जेहिरे दिया कुछ हाथ । कुछ नहिं कोई लैजायही, दिया जाय पै साथ ॥ खण्ड ग्यारहवां बोहितखण्ड ॥ संत नडोल देखा गजपंती । राजादत्त संत दोनों सती ॥ आपन नाहिं कर्यो पी कंथा । जीवदीन्ह अगमन तेहि पंथाँ ॥ निश्चै चला भर्म डर खोय । साहंसैं जहां सिद्ध तहँ होय ॥ निश्चै चला छांड़िकै राजू । बोहितैं दीन्ह दीन्ह सब साँजू ॥ चढ़ा वेगै औ बोहितैं पेली । धन वह पुरुष प्रेमपंथै खेली ॥ शेरलाल १ ज़्यादा २ बदन ३-२१ दुनियां दौलत ४ रुपया ५ ईश्वर ६ ज़िन्दगानी ७ दुनियां ८-१० ऊपर ६ मकान ११ रात १२ नाम सखी १३-१४ पाक्साफ़ १५ राह १६-२३-३१ ईमान १७ नाम राजा १८ सखावत १६ सच्चाई २० पहिले २२ बहादुर २४ कामिल २५ नाव २६ सामान २७ जल्द २८ जहाज़ २६ मर्द ३० ॥