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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 72

पद्मावत । ७१ उलटहिं माणिक मोती हीरा । दर्ब देखि मन होय न धीरा ॥ मनो अनचाह दर्ब औ भोगू । पंथ भुलाय बिनाशै योगू ॥ योगी मनहिं उही रिस मारहिं । दर्ब हाथकै समुद्र पयारहिं ॥ दर्ब लेइ जो इस्तिरे राजा । जो योगी तेहिके केहि काजा ॥ पंथी पंथै दर्ब रिपु होई । ठग बटपारं चोर सँग सोई ॥ पंथी सोई दर्ब सो रूसे । दर्ब समेट बहुत अस मूसे ॥ दो० क्षीरसमुद्र सब नांघा, आये समुद्रदधि माहिं । जोहै पंथ के बावरे, नांतेहिं धूप न छांहिं ॥ दधि समुद्र देखत तसदहों। प्रेमके लुब्धै दग्धै पैसा ॥ प्रेम जो डांढौ धन वह जीव । दधि जमाय मथिकाढ़ै घीव ॥ दधि इकबूंदजामिसवक्षीरूँ । कांजी बूंदविनशियोयनीरूँ ॥ स्वांस डांढे मनमथनी गाढ़ी । हिये ज्योति बिनफूटिनसोंढी ॥ जेहिजियप्रेम चंदन तेहिआगे । प्रेमभवैनै फिर डर नहिंभागे ॥ प्रेमकी आग जरै जो कोय । ताकर दुख नहिं मिथ्यों होय ॥ जो जानहि सत आपहिंजारा । नास्तै हिये संत करेन पारा ॥ दो० दधि समुद्र पुनि पारभे, प्रेमहि कहां सँभार । भावै पानी शिरपरै, भावै परहि अँगार ॥ आय उदधिजलै समुद्रअपारा । धर्ती स्वर्ग जरै तेहिं झारा ॥ आग जो उपँजी ओही समुन्दा । लंका जरी वही एकबुन्दा ॥ विरह जो उपजी ओही काढ़ा । खन न बुझाय जाय तन बाढ़ा॥ राह १-५-१० तैरना २ क़ायम ३ मुसाफ़िर ४ राह लूटनेवाले ६ राह चलनेवाले ७ अर्थात् माल वा दौलत पास अपने न राखे ८ दही ९-१६- १७-२८ दीवाने ११ जलताहुआ १२ आशक १३ आंच १४ औटाहुआ १५ दूध १८ खटाई १६ पानी २० रस्सी २१ दिल २२-२७ चालाई २३ मकान २४ ख़राब २५ कमहिम्मत २६ नामसमुद्र २९ ज़मीन ३० आसमान ३१ पैदा होना ३२-३३ ॥