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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 88

योगीयोग जो इमि सहै, सिद्ध समापत तास ॥ (१) खण्डसोलहवां बसन्तखण्ड ॥ दई दई कर सुरत गँवाई । श्रीपञ्चमी पूजि तब आई ॥ भयो हुलास नवल ऋतुमाहां । क्षण न सुहाय धूप औ छाहां ॥ पद्मावत सब सखी हँकारी । जानवन्त सिंहलकी बारी ॥ आज बसन्त नवल ऋतुराजा । पंचम होय जगत सबसाजा ॥ नवल श्रृँगार बनाहंत कीन्हा । शीशे परोसहिं सैंदुर दीन्हा ॥ बिकँसे कमल फूल बहुवासा । भँवरआय लुब्धे चहुँ पासा ॥ पियर पात दुख भरे निपौते । सुख पलहा उपजी होय शैते ॥ दो० अवधि आय सो पूजे, जो इच्छा मन कीन्ह । चलहु देवमढ़ गोहनें, चहो सो पूजा दीन्ह ॥ फिरे आन ऋतु बाजन बाजे । औ श्रृंगार बारहि सब साजे ॥ कमल करी पद्मावत रानी । होय मालति जानौ बिगसानी ॥ तारामन्दे पहिर भल चोला । भरी शीश संवनखत अमोला ॥ सखी कुमोद सहंसदश सङ्गा । सबै सुगन्ध चढ़ाये अङ्गा ॥ सब राजा रायनकी बारी । बरन बरन पहिरैं सब सारी ॥ सबै स्वरूप पद्मिनी जाती । पान फूल सैंदुर सब राती ॥ करें कलोलें सुरङ्ग रँगीली । औ चोवा चन्दन सब खेली ॥ दो० चहुँदिशि रही वासना, फुलवारी अस फूल । वे बसन्त सों फूली, गा बसन्त वहि भूल ॥ इसतरह १ कामिल २ खुशी ३ नया ४-६ भुलाना ५ जहांतक ६ लड़की ७-२०-२७ दुनियां ८ पेड़ १० शिर ११-२३ दाख १२ खिलना १३-२१ लपटना १४ झरना १५ पैदा १६ लाल १७-२६ हद १८ साथ १९ नाम कपड़ा २२ कोफावेली २४ हज़ार २५ बदन २६ रंगवरंग २८ खुशी ३० चारों तरफ ३१ ॥