पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ पद्मावत । तस कुछ कहा न जाय निवेदा । अर्जुन बान राहु को बेधा ॥ दो० जनहुँ लङ्क सब लूसी, हनू बिधांसी बार । जाग उठ्यों अस देखत, कहु सखि स्वप्न विचार ॥ सखी सो बोली स्वप्न विचारी । काल्ह जो गई देवें करबारी ॥ पूजि मनायो बहुत बिनौती । परसन्र आय भयो तुम्हराती ॥ सूरज पुरुषँ चांद तुम रानी । अस वर देव मिलावै आनी ॥ पढ़ों खण्ड कर राजा कोई । सो आवै बर तुम कहँ होई ॥ कुछ पुनि जूझ लाग तुम रामा । रावण सेते होयँ संग्रामा ॥ चांद सूर्य सों होय बिवाहू । वारेबिधां सब बेधै राहू ॥ जस ऊषौ कहँ अनिरुध मिला । मेट न जाय लिखा परैवला ॥ दो० सुख सुहाग है तुम कहँ, पान फूल रस भोग । आजकाल्हभा चाहै, अस सपने का संयोग ॥ खण्ड सत्रहवां सतीखण्ड राजा रतनसेन ॥ किये बसन्त पद्मावत गई । राजा तब बसन्त सुध भई ॥ जो जागा न बसन्त न बौरी । ना सो खेल न खेलनहारी ॥ नावहिं की वह रूप सुहाई । गइ हिराइ पुनिदृष्टि १६ न आई ॥ फूल झड़ी सूखी फुलवारी । दृष्टि १७ परी उकटी सब छौरी ॥ कै यह बसत बसन्त उजारा । गा सो चांद अथवा ले तारा ॥ अबतेंहिबिनजगै भा अँधकूपी । वह सुखछांह जराहखधूपा ॥ बिरहदेंवां को जरत सिरावा । को पीतम सों करै मिलावा ॥ दो० हिये २२ देख जो चन्दन, मिलके लिखा विछोहैं । : लूटना १ हनुमानजी २ दरवाज़ा तोड़ना ३-११ महादेव के मंडफ ४ आजज़ी ५ खुश ६ मर्द ७ खाविन्द ८-६ लड़ाई १० नाम लड़की १२ ज़बर- दस्त १३ ताबीर १४ बाग १५ निगाह १६-१७ जलजाना १८ दुनियां १६ कुवां २० आग २१ दिल २२ जुदाई २३ ॥