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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पद्मावत । ६७ कामैं कीन्ह जो कायापोषी । दोषै न मोहिं आप निरदोषी ॥ फाग बसन्त खेल गइ गोरी । मोहितनलाग आग जस होरी॥ अबअसकाहिद्यारै शिरमेलों । छारेहनों फाग तस खेलों ॥ कित तप कीन्ह छांड़िके राजू । आहुंरेंगयों न भा सिधिकांजू ॥ पायौं न होय योगी यती । अब सरैं चढ़ों जगैं जस सती ॥ दो० आय पीतम फिरगया, मिला न आय बसन्त । अबतन होरी लायके, जार करों भसमन्त ॥ कुकनों पंख जैसो सँरि साजा । तस सरिबैठि जराचहिराजा ॥ सकल देवता आय तुलाने । वहिं कस होय देवअस्थाने ॥ विरह अगिन वज्रांगे असूझा । जरै शूरै न बुझाये बूझा ॥ तेहिके जरत जो उठै बिजौंगी । तीनों लोकजरहिं तेहिलागी॥ अबकी घड़ी चिनग तेहिं छूटे । जराहिं पहाड़ पहनै सब फूटे ॥ देवता सबै भस्म होय जाहीं । छार समेटे पावत नाहीं ॥ धर्ती स्वर्ग होय सब तातौ । है कोई यहि राखि विधातौ ॥ दो० मुहम्मद चिनग प्रेमसुनि, गगनैं औ मही डराय । धन विरहिन औ धनहियों, जहँयह अगिन समाय ॥ हनुमत वीर लङ्क जे जारी । पर्वत उही अहा रखवारी ॥ बैठि तहां भा लङ्का ताका । छठये मासैं वही उठ हांका ॥ तेहिकी आग वहू पुनि जरा । लङ्का छांड़ि पलङ्गो परा ॥ तहां जाय यह कहा सँदेशू । पार्व्बती औ जहां महेँशू ॥ तनपालना १ कसूर २ राख ३ उमर ४ चिता ५-७ नाम चिड़िया ६ सब ८ पहुँचना ६ मकान १० सख्त ११ बहादुर १२ लूक १३ पत्थर १४ ज़मीन १५-२० आसमान १६-१६ गर्म १७ ईश्वर १८ दिल २१ महीना २२ कहां २३ महादेवजी २४ ॥