भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पंचकोशविवेकप्रकरणम् ८३ वह आत्मा अवेद्य होकर भी [अर्थात् इन्द्रियजन्यज्ञान का विषय न होकर भी] अपरोक्ष रहता है इसी से वह स्वयं- प्रकाश माना जाता है। श्रुति ने ब्रह्म का जो कि सत्य ज्ञान तथा अनन्त लक्षण बताया है वह लक्षण इस आत्मा में भी है। इस कारण उस स्वयंप्रकाश तत्व को ब्रह्म मान लेना चाहिये। सत्यत्वं बाधराहित्यं, जगद्बाधैकसाक्षिणः । बाधः किंसाक्षिको ब्रूहि, नत्वसाक्षिक इष्यते ॥२९॥ [सत्य और अबाध्य, मिथ्या और बाध्य ये सब पर्याय- वाची शब्द हैं] सत्य उसी को कहते हैं जिसकी बाधा न होती हो। [जिस के मिथ्यापन का निश्चय कभी न होता हो] इस सकल जगत् की बाधा का जो एक मात्र साक्षी है, उस के बाध का साक्षी कौन होगा उसे हमें बताओ ? क्योंकि विना साक्षी का तो कोई बाध माना ही नहीं जाता। तात्पर्य यह है कि सुषुप्ति, मूर्छा तथा समाधि के समय, जब यह स्थूल सूक्ष्म शरीरादि नाम का जगत् नहीं रहता, उस जगत् के न रहने को जो जानता है अथवा शास्त्रीय शब्दों में यों कहो कि जो आत्मा इस बाध का साक्षी है, उस आत्मा के बाध का साक्षी [उस आत्मा के न रहने को जानने वाला] कौन होगा ? उसका तो कोई भी साक्षी नहीं हो सकता । बिना साक्षी के ही आत्मबाध मान लेना ठीक नहीं है। अतिप्रसक्ति के डर से साक्षिरहित बाध को कोई भी नहीं मानता है। अपनीतेषु मूर्तेषु ह्यमूर्तं शिष्यते वियत् । शक्येषु बाधितेष्वन्ते शिष्यते यत्तदेव तत् ॥३०॥