पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८४ पञ्चदशी
मूर्त पदार्थों के हटा दिये जाने पर जैसे अमूर्त आकाश शेष रह जाता है, इसी प्रकार वाधा करने योग्य पदार्थों की बाधा कर देने पर पीछे से जो अबाध्य तत्व शेष रह जाता है, वही ब्रह्म है । घर में रक्खे हुए घटादि मूर्त पदार्थ, जब उसमें से बाहर निकाल दिये जाते हैं, तब जैसे हटाया न जा सकने वाला एक आकाश ही घर में शेष रह जाता है । इसी प्रकार आत्मा से भिन्न देहेन्द्रियादि मूर्त और अमूर्त पदार्थों के—जिनका कि निराकरण हो सकता है—'नेति नेति' श्रुति से हटा दिये जाने पर, पीछे से सम्पूर्ण निराकरणों [निषेधों] का साक्षी जो भी बोध शेष रह जाता है, बाधरहित वही तत्व 'आत्मा' कहाता है । सर्वबाधे न किञ्चिच्चेद्यन्न किंचित्तदेव तत् । भाषा एवात्र भिद्यन्ते निर्बाधं तावदस्ति हि ॥३१॥ 'तुम्हारी कही विधि से सब की बाधा कर देने पर तो, कुछ भी नहीं रहता है' ऐसा यदि कोई कहने लगे, तो उस से कहो कि जो 'कुछ भी नहीं है' उसी को ब्रह्म जान लो । 'न किंचित्' इस शब्द से जिस चैतन्य का उल्लेख किया जाता है उसी को ब्रह्म मान लेना चाहिये । तात्पर्य यह है कि जो मनुष्य यह कहता है कि 'कुछ भी शेष नहीं रहता' उस को सकलाभाव विषय का [सब कुछ न होने का] ज्ञान तो अवश्य ही मानना होगा । बस तब हम कहेंगे कि यह ज्ञान ही हमारे आत्मा का स्वरूप है । अरे भाई, इस बाधसाक्षी प्रत्यगात्मा के विषय में 'न किंचित्' आदि