पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चकोशविवेकप्रकरणम् ८५ भाषा ही भिन्न भिन्न हो गई हैं। बाधरहित साक्षिचैतन्य तो एक ही है। यह और बात है कि उस चैतन्य का वर्णन हम भले ही 'न किंचित्' इस अभाववाचक शब्द से कर डालें। बाध का साक्षी तो हमें प्रत्येक अवस्था में मानना ही पड़ेगा। उस के वाचक शब्दों में झगड़ा हो सकता है। वाच्य आत्मतत्व में तो किसी प्रकार की भी विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती। अत एव श्रुतिर्बाध्यं बाधित्वा शेषयत्यदः । स एष नेति नेत्यात्मेत्यतद्व्यावृत्तिरूपतः ॥३२॥ क्योंकि यह साक्षिचैतन्य एक अबाध्य वस्तु है इसलिये 'स एष नेति नेत्यात्मा' (बृ० ३-९-२६) इस श्रुति ने, अनात्म पदार्थों का निषेध करते करते, निषेध करने योग्य सब अनात्म पदार्थों की बाधा करके, निराकरण के अयोग्य, इस प्रत्यक् स्वरूप को शेष रख लिया है। इदं रूपं तु यद्यावत् त्यक्तुं शक्यतेऽखिलम् । अशक्यो ह्यनिदंरूपः स आत्मा बाधवर्जितः ॥३३॥ जो 'इदं' है [जो दृश्य रूप से हमारे अनुभव में आता है] वह जितना भी [देहेन्द्रियादि सम्पूर्ण दृश्य जगत्] है वह तो सब का सब ही त्याग किया जा सकता है। परन्तु प्रत्यग्रूप होने से जिस को 'इदं' नहीं कह सकते, उस साक्षी आत्मा का त्याग तो हो ही नहीं सकता [क्योंकि वह तो त्याग करने वाले का अपना स्वरूप ही है, फिर उस का त्याग कैसे किया जा सकता है ?] निष्कर्ष यही निकलता है कि वह बाधरहित [सत्य] साक्षी ही आत्मा है [अहंकारादि दृश्य पदार्थ आत्मा नहीं हैं]।