भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 104

८६ पंचदशी सिद्धं ब्रह्मणि सत्यत्वं, ज्ञानत्वं तु पुरेरितम् । स्वयमेवानुभूतित्वादित्यादिवचनै स्फुटम् ॥३४॥ ब्रह्म के लक्षण में जिस सत्यता का वर्णन आया है वही सत्यता आत्मा में भी है यह यहां तक सिद्ध हो गया । इसी प्रकरण के 'स्वयमेवानुभूतित्वाद्विद्यते नानुभाव्यता' इत्यादि तेरहवें श्लोक में आत्मा की ज्ञानरूपता भी पहले भले प्रकार कही जा चुकी है । न व्यापित्वाद्देशतोऽन्तो नित्यत्वान्नापि कालतः । न वस्तुतोऽपि सर्वात्म्या दानन्त्यं ब्रह्मणि त्रिधा ॥३५॥ व्यापक होने से देशकृत अन्त नहीं, नित्य होने से काल- कृत अन्त नहीं, सर्वात्मा होने से वस्तुकृत अन्त नहीं, यों ब्रह्म में तीन प्रकार की अनन्तता होती है । 'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्' (मुण्ड० १-१-६) 'आकाशवत् सर्वगतश्च नित्यः' 'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्' (कठ० २-४-१३) 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृ० २-४-६) 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्म' (माण्डू० २) 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' इत्यादि श्रुतियों में ब्रह्म की व्यापकता नित्यता और सर्वात्मकता का उल्लेख किया गया है । इस से ब्रह्म में तीन प्रकार की अनन्तता माननी चाहिये कि यह ब्रह्म देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है । व्यापक होने के कारण उस का देशकृत अन्त कहीं नहीं होता---'कि यहां वा यहां ब्रह्म नहीं है' । नित्य होने के कारण उस का कालकृत अन्त कभी नहीं होता कि—'तब ब्रह्म नहीं था, अब ब्रह्म नहीं है, तब ब्रह्म नहीं रहेगा इत्यादि' । सब का आत्मा होने के कारण उस का वस्तुकृत अन्त भी नहीं