पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंओम् द्वैतविवेकप्रकरणम् ईश्वरेणापि जीवेन सृष्टं द्वैतं विविच्यते । विवेके सति जीवेन हेयो बन्धः स्फुटीभवेत् ॥१॥ [कारणोपाधि] ईश्वर तथा [कार्योपाधि] जीव के बनाये हुए द्वैत को अब पृथक् पृथक् कर के दिखाया जाता है [कि कौन सा द्वैत ईश्वरकृत है तथा कौन सा जीव का बनाया हुआ है] । जीव और ईश्वर के बनाये हुए द्वैत का विवेक हो जाने पर यह मालूम हो जायगा कि जीव को इस बन्ध [ किंवा बन्धहेतु द्वैत ] को छोड़ देना चाहिये । [ तब यह निश्चय हो सकेगा कि जीव को इतना द्वैत तो छोड़ देना चाहिये और इतने द्वैत को छोड़ना नहीं चाहिये । इस द्वैत को हटाना हमारे बस का नहीं है क्योंकि वह द्वैत ईश्वर के संकल्प से बना है । हमें तो अपना द्वैत हटाना है । ] मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । स मायी सृजतीत्याहुः श्वेताश्वतरशाखिनः ॥२॥ प्रकृति को तो 'माया' समझना चाहिये तथा महेश्वर को 'मायी' ( माया का मालिक ) जानना चाहिये । वह मायी ही इस जगत् का सर्जन किया करता है, ऐसा श्वेताश्वतर शाखा वाले कहते हैं [ इस प्रमाण के रहते हुए जीवों के अदृष्टादि किसी को भी जगत् का कारण मानना ठीक नहीं है ] ।