भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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[Header] द्वैतविवेकप्रकरणम् ९७ ज्ञानों से और अपने कर्मों से जीव ने इन को अपना अन्न बना लिया है। ईशकार्यं जीवभोग्यं जगद् द्वाभ्यां समन्वितम् । पितृजन्या भर्तृभोग्या यथा योषित् तथेष्यताम् ॥१८॥ [ समानरूप में वर्णन किया हुआ ] जगत् ईश्वर का उत्पन्न किया हुआ है और जीव का भोग्य है । यों यह जगत् ईश्वर और जीव दो से सम्बद्ध है । एक तो इस जगत् का बनाने वाला है और दूसरा इसको भोगने वाला है [ एक चीज़ दो से सम्बद्ध रहती है इसके लिये दृष्टान्त यह है कि ] जैसे स्त्री अपने पिता से तो उत्पन्न होती है और पति की भोग्य होती है । इसी तरह इस जगत् को भी दो से सम्बद्ध समझ लेना चाहिये । मायावृत्त्यात्मको हीशसंकल्पः साधनं जनौ । मनोवृत्त्यात्मको जीवसंकल्पो भोगसाधनम् ॥१९॥ जब ईश्वर मायावृत्त्यात्मक संकल्प करता है, तब तो यह जगत् उत्पन्न हुआ करता है । जब यह जीव मनोवृत्ति नाम का संकल्प करता है, तब यह जगत् उस का भोग्य बन जाता है [ यों ईश्वर और जीव के संकल्प से ही इस जगत् का सर्जन और भोग होता है । अज्ञान से यह जगत् बनता है और मन से यह जगत् भोगा जाता है ] । ईशनिर्मितमण्यादौ वस्तुन्येकविधे स्थिते । भोक्तृधीवृत्तिनानात्वात् तद्भोगो बहुधेष्यते ॥२०॥ हृष्यत्येको मणिं लब्ध्वा क्रुध्यत्यन्यो ह्यलाभतः । पश्यत्येव विरक्तोऽत्र न हृष्यति न कुप्यति ॥२१॥