भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

९८ पञ्चदशी [ईश्वर के बनाये हुए वस्तुस्वरूप से भिन्न भी कोई भोग्यत्व आकार होता है इसे निश्चय करना हो तो यों समझना चाहिये कि ] जभी तो ईश्वर की बनायी हुई मणि आदि वस्तु, भले ही एक प्रकार की रहो, परन्तु भोक्ता लोगों की बुद्धि- वृत्तियों के नाना प्रकार की होने पर, उस एक ही मणि का नाना प्रकार का भोग होजाता है ॥२०॥ देखते हैं कि मणि का लालची तो उसे पाकर हृष्ट होता है, दूसरे लालची को जब वह मणि नहीं मिलती तब उसे क्रोध आता है, मणि के विषय में जो लापरवाह है वह तीसरा उदास मनुष्य तो उस मणि को देखता ही देखता है [ मणि मिलने से ] न उसे हर्ष होता है और [ मणि के न मिलने से] उसे क्रोध भी नहीं आता है । प्रियोऽप्रिय उपेक्ष्यश्चेत्याकारा मणिगास्त्रयः । सृष्टा जीवै रीशसृष्टं रूपं साधारणं त्रिषु ॥२२॥ [ जीव के बनाये हुए आकारभेदों का वर्णन इस श्लोक में किया गया है ] प्रिय, अप्रिय तथा उपेक्ष्य ये तीन आकार मणि में पाये जाते हैं । ये तीनों ही आकार जीवों के बनाये हुए हैं। इन तीनों में साधारण रीति से अनुस्यूत जो मणि का स्वरूप है वही ईश्वर का बनाया हुआ रूप कहाता है। भार्या स्नुषा ननान्दा च याता मातेत्यनेकधा । प्रतियोगिधिया योषिद्भिद्यते न स्वरूपतः ॥२३॥ [ एक ही वस्तु में जीव के बनाये हुए आकार किस प्रकार भिन्न भिन्न होते हैं, यही बात इस श्लोक में दूसरा उदाहरण देकर समझायी गयी है ] देखा जाता है कि सम्बन्धियों की भिन्न भिन्न बुद्धि के कारण एक ही स्त्रीशरीर 'भार्या' भी