भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पञ्चभूतविवेकप्रकरणम् ५९

कहाता है 'स्नुषा' [ पुत्रवधू ] भी कहा जाता है 'ननान्दा' भी
समझा जाता है 'याता' [ देवर की स्त्री ] भी मान लिया जाता
है और 'माता' भी कहलाने लगता है । ईश्वर ने इसे स्वरूप
से तो केवल स्त्री ही बनाया था परन्तु प्राणियों ने अपने
भिन्न भिन्न भावों के अनुसार उस एक ही स्त्री को पत्नी,
पुत्रवधू, ननान्दा [ पति की बहन ] याता, तथा माता मान
लिया है ।
ननु ज्ञानानि भिद्यन्ता माकारस्तु न भिद्यते ।
योषिद्वपुष्यतिशयो न दृष्टो जीवनिर्मितः ॥२४॥
शंका होती है कि—स्त्री विषयक ज्ञान ही तो भिन्न भिन्न
उपलब्ध होते हैं, उन ज्ञानों का विषय बनी हुई स्त्री का स्वरूप
तो भिन्न नहीं होता है । वह तो वैसे का वैसा ही रहता है ।
[ फिर यह क्यों कहा जाता है कि सम्बन्धियों की भिन्न भिन्न
बुद्धि से स्त्री भी भिन्न भिन्न हो जाती है ? ]
मैवं मांसमयी योषित् काचिदन्या मनोमयी ।
मांसमय्या अभेदेऽपि भिद्यते हि मनोमयी ॥२५॥
[ ज्ञेय पदार्थ की विलक्षणता के बिना ज्ञान में विलक्षणता
आती ही नहीं इस सिद्धान्त के कारण ज्ञेय में आकार का भेद
मानना ही चाहिये, इस अभिप्राय से पूर्वोक्त आक्षेप का परिहार
इस श्लोक में किया जाता है कि ] तुम्हारा आक्षेप ठीक
नहीं। क्योंकि एक स्त्री में दो स्त्रियां रहती हैं, एक मांसमयी
दूसरी 'मनोमयी' । 'मनोमयी' स्त्री उस 'मांसमयी' स्त्री से
सर्वथा भिन्न होती है । 'मांसमयी' स्त्री तो यद्यपि एक ही
रहती है परन्तु 'मनोमयी' स्त्री भिन्न भिन्न हो जाती हैं ।