पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहुआ ही करता है । इसके विपरीत समाधि सुषुप्ति तथा मूर्छा के समय, इन बाह्य पदार्थों के विद्यमान रहने पर भी, सुखी या दुःखी नहीं होता । इससे यही सिद्ध होता है कि सुख दुःख के साथ बाह्य पदार्थ के अन्वय व्यतिरेक हैं ही नहीं । किन्तु सुख दुःख के साथ मानस पदार्थ के ही अन्वय व्यतिरेक हैं। उन्हीं से जीव सुखी या दुःखी हुआ करता है (केवल बाह्यार्थ से कोई भी सुखी या दुःखी नहीं होता है ।) दूरदेशं गते पुत्रे जीवत्येवात्र तत्पिता । विप्रलम्भकवाक्येन मृतं मत्वा प्ररोदिति ॥३४॥ मृतेऽपि तस्मिन् वार्ताया मश्रुतायां न रोदिति । अतः सर्वस्य जीवस्य बन्धकृन्मानसं जगत् ॥३५॥ [मनोमय प्रपंच ही बन्धक होता है । उसी के साथ सुख दुःख का अन्वयव्यतिरेक है। यह बात एक अत्यन्त स्पष्ट उदा- हरण से इस श्लोक में समझायी गयी है ](जब किसी का पुत्र किसी दूरदेश को चला गया होता है और वहाँ भला चंगा ही रहता है परन्तु घर बैठा हुआ उसका पिता किसी धोखेबाज के झूठ-मूठ ही यह कह देने से कि तुम्हारा पुत्र तो मर गया अपने मनोमय पुत्र को मरा हुआ मान कर, फूट फूट कर रोने लगता है। [३४] तथा उसी पुत्र के परदेश में यथार्थ ही मर जाने पर भी उसके मरने की बात न सुनने पर रोता नहीं है।) इस बात को देख कर यही निश्चय करना पड़ता है कि जीव को मानस जगत् ही सब को बन्धन में डाला करता है । विज्ञानवादो बाह्यार्थवैयर्थ्यात् स्यादिहेति चेत् । न हृद्याकारमाधातुं बाह्यस्यापेक्षितत्वतः ॥३६॥