पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें'यदि धीमय जगत् को ही बन्धन का कारण मानें तो बाह्यार्थ की कुछ जरूरत नहीं रह जाती । फिर ऐसी अवस्था में विज्ञानवाद आ खड़ा होता है' ऐसी किसी को शंका हो तो उस से कहो कि—हृदय में आकार को बैठाने [जमाने] के लिये तो बाह्य पदार्थ की अपेक्षा होती ही है । [तात्पर्य यह है कि यद्यपि बन्ध का कारण तो मानस प्रपंच ही है । परन्तु मानस प्रपंच को उत्पन्न करने वाला तो बाह्य प्रपंच ही होता है । यों बाह्यार्थ को भी स्वीकार करने के कारण हम विज्ञान- वादी नहीं हो जाते हैं]। वैयर्थ्यमस्तु वा, बाह्यं न वारयितुमीश्महे । प्रयोजनमपेक्षन्ते न मानानीति हि स्थितिः ॥३७॥ अथवा बाह्यार्थ व्यर्थ भी रहो, तो भी हम [विज्ञानवादी की तरह] बाह्य पदार्थ का वारण नहीं कर सकते हैं। [विज्ञान- वादी तो बाह्यार्थ का अपलाप करते हैं। वैसा हम नहीं करते। यही हमारा उन का भेद है] सिद्धान्त तो यह है कि प्रमाण प्रयोजन की अपेक्षा (परवाह) ही नहीं करते हैं । किसी भी वस्तु की सिद्धि प्रयोजन के अधीन नहीं होती है । किन्तु प्रमाण के अधीन होती है । जिस पदार्थ को प्रमाणों ने सिद्ध कर दिया हो, फिर भले ही उस का कुछ भी प्रयोजन न हो, उस को असत् नहीं माना जा सकता है । बन्धश्चेन्मानसंद्वैतं तन्निरोधेन शाम्यति । अभ्यसेद् योगमेवातो ब्रह्मज्ञानेन किं वद ॥३८॥ मानस द्वैत ही यदि बन्ध का कारण है, तो बस केवल उस मन का निरोध करने से ही वह बन्ध शान्त हो सकता