पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ पञ्चदशी इस के मूलाधार को टटोलते हैं तब हमारी दृष्टि ब्रह्मतत्त्व पर जा पड़ती है । यों इस की सत्यता से हम बंधते हैं और इस के नकार से हम छुट जाते हैं। यों ईश्वर का द्वैत तो हमारे बड़े ही काम की वस्तु है] । प्रलये तन्निवृत्तौ तु गुरुशास्त्राद्यभावतः । विरोधिद्वैताभावेपि न शक्यं बोद्धुमद्वयम् ॥४१॥ प्रलय काल में, जब कि द्वैत छिप जाता है, और अद्वैत ज्ञान का विरोधी द्वैत नहीं रह जाता, तब भी अद्वय भाव को जाना नहीं जा सकता । क्योंकि अद्वय भाव को जताने वाले गुरु या शास्त्र उस समय नहीं रहते । जो यह समझा बैठा है कि द्वैत को मिथ्या समझने से अद्वैत ज्ञान उत्पन्न नहीं हो सकता । किन्तु अद्वैत ज्ञान के लिए द्वैत का निवारण कर डालना—द्वैत को मार भगाना—ही अत्या- वश्यक होता है, उसको यों समझाना चाहिये कि—प्रलय- काल में, जब कि तुम्हारे भी मत में द्वैत की निवृत्ति हो जाती है, जब कि विरोधी द्वैत का सर्वथा निवारण हो जाता है, जब कि अद्वैत ज्ञान का विरोध करनेवाला द्वैत शेष ही नहीं रह जाता है, तब ज्ञान के साधन गुरु अथवा शास्त्रादि के न रह जाने के कारण ही से, अद्वय वस्तु का बोध किसी को भी नहीं हो सकता। इसी से कहते हैं कि द्वैत का निवारण करना कोई आवश्यक बात नहीं है । उसको तो मिथ्या समझने से ही साधक का काम चलता है। यों मिथ्या समझने में ईश्वर के द्वैत का उपयोग है ही। अबाधकं साधकं च द्वैतमीश्वरनिर्मितम् । अपनेतुमशक्यं चेत्यास्तां तद् द्विष्यते कुतः ॥४२॥