पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें['द्वैत के रहते रहते अद्वैतज्ञान कैसे हो सकता है' इसका समाधान यह है कि ] ईश्वर का बनाया हुआ द्वैत तो अद्वैत के ज्ञान में बाधा नहीं डालता । उसको ही तो मिथ्या समझने से अद्वैत ज्ञान की उत्पत्ति हुआ करती है । इस कारण वह तो अद्वैत ज्ञान की उत्पत्ति में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाल सकता । प्रत्युत गुरुशास्त्रादिरूपी जो द्वैत है वह तो अद्वैत ज्ञान का साधक होता है । इसके अतिरिक्त ईश्वर के बनाये हुए आकाशादि रूप द्वैत को हम क्षुद्र संकल्प वाले लोग हटा भी तो नहीं सकते हैं [क्योंकि वह सत्य संकल्प है । उसका संकल्प हमसे नहीं तोड़ा जा सकता ] इन हेतुओं से उस बिचारे द्वैत को रहने दो, उससे द्वेष मत ठानो । जीवद्वैतं तु शास्त्रीयमशास्त्रीयमिति द्विधा । उपाददीत शास्त्रीयमातत्त्वस्यावबोधनात् ॥४३॥ 'शास्त्रीय' और 'अशास्त्रीय' भेद से जीव का बनाया हुआ द्वैत भी दो प्रकार का होता है । उसमें से तत्व का ज्ञान होने तक शास्त्रीय द्वैत को तो पकड़े ही रहना चाहिये । आत्मब्रह्मविचाराख्यं शास्त्रीयं मानसं जगत् । बुद्धे तत्त्वे तच्च हेयमिति श्रुत्यनुशासनम् ॥४४॥ प्रत्यग्रूप ब्रह्म का विचार या श्रवण आदि जिसको कहते हैं वह शास्त्रीय मानस जगत् [द्वैत ] कहाता है। जब तत्व का [पूरा पूरा] परिज्ञान हो चुके तब तो उस शास्त्रीय द्वैत का परित्याग कर ही डालना चाहिये । यह बात श्रुति ने कही है । साधक लोग तत्व के समझ में आजाने पर भी शास्त्रवासना में उलझे न रहकर ब्रह्माभ्यास को बढ़ाते जायें यही इसका भाव है ।