पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०८ पञ्चदशी शास्त्राण्यधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः । परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कावत् तान्यथोत्सृजेत् ॥४५॥ ग्रन्थमभ्यस्य मेधावी ज्ञानविज्ञानतत्परः । पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद् ग्रन्थमशेषतः ॥४६॥ तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । नानुध्यायाद् बहूञ्छब्दान् वाचो विग्लापनं हि तत् ॥४७॥ [ तत्व बोध के बाद शास्त्रीय द्वैत को छोड़ ही देना चाहिये यह बात इन श्रुतियों में कही गयी है ] मेधावी पुरुष शास्त्रों को पढ़े, उनका बार बार अभ्यास करे, जब परब्रह्म को पहचान ले, उसके पश्चात् मार्ग देखकर निकम्मी हुई उल्का के समान उन्हें तुरन्त फेंक दे ॥४५॥ ग्रन्थों का अभ्यास करके जब ज्ञान तथा विज्ञान में तत्पर हो जाय तो फिर मेधावी पुरुष ग्रन्थों का पूर्ण परित्याग इस प्रकार कर दे जैसे धान्यार्थी लोग धान्य निकाल कर पुराल को कहीं भी पड़ा छोड़ देते हैं। [फिर साधकों को ग्रन्थव्यसन में नहीं उलझे रहना चाहिये। ग्रन्थ तो इस मार्ग तक हमें पहुँचा देने के लिए थे। इस परमपद को देखकर भी ग्रन्थों में फँसे रहना तो ऐसा है जैसे पार जाकर नाव पर से कोई उतरना ही न चाहता हो ] ॥४६॥ धीर ब्राह्मण उसी आत्म-तत्व को जान कर अपनी बुद्धि को सदा तदाकार बना डाले। शास्त्रों की खटपट में या बहुत सी बातों की उलझन में फँसा न रह जाय। क्योंकि वह वाणी की कोरी कसरत ही तो है ॥४७॥ तमेवैकं विजानीथ ह्यन्या वाचो विमुञ्चथ । यच्छेद्वाङ् मनसी प्राज्ञ इत्याद्याः श्रुतयः स्फुटाः ॥४८॥