पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३२० पञ्चदशी
यद्यपि परात्मतत्व समस्त देशों, सम्पूर्ण कालों, तथा सकल वस्तुओं से अपरिच्छिन्न ही है, परन्तु वह इस मायाकल्पित जगत् में माया की ओढ़नी ओढ़ कर छिप कर बैठ गया है। जब तो वही परमात्मा शमदमादि साधनों से युक्त होने के कारण, ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के योग्य बने हुए, और श्रवण मननादि किये हुए, मनुष्यादि के अधिकारिशरीर में, बुद्धि किंवा सूक्ष्म शरीर का भासक होकर फिर प्रकाशित होने लग पड़ता है— अपनी माया की ओढ़नी को उतार कर फेंक देता है—इस महा- वाक्य का 'अहं' शब्द उसी परात्मा की ओर को इशारा कर रहा है। स्वतः पूर्णः परात्ममात्र ब्रह्मशब्देन वर्णितः । अस्मीत्यैक्यपरामर्श स्तेन ब्रह्म भवाम्यहम् ॥४॥ [अब इसी 'अहं ब्रह्मास्मि' महावाक्य में के ब्रह्म शब्द का अर्थ बताया जाता है] स्वभाव से ही [देशकालादि के परि- च्छेद में न आने वाले] परिपूर्ण परात्मा को इस महावाक्य में 'ब्रह्म' कहा गया है। इसी महावाक्य में जो कि 'अस्मि' [हूँ] पद है, उस से जीव और ब्रह्म की एकता का परामर्श किया गया है। जिस का यही सारांश होता है कि मैं ब्रह्म ही हूँ। [मनुष्यादि देहों की दुर्बलताओं से दब कर मरने वाला—मनु- ष्यादि देहों के परिच्छेद में आकर क़ैदी बना हुआ—इन देहेन्द्रियादिरूपी उपनेत्र की क्षुद्र और संकीर्ण दृष्टि से ही विचार करने वाला—क्षुद्र प्राणी मैं नहीं हूँ]। एकमेवाद्वितीयं सन्नामरूपविवर्जितम् । सृष्टेः पुराधुनाप्यस्य तादृक्त्वं तदितीर्यते ॥५॥