पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहावाक्यविवेकप्रकरणम् १२१ [अब सामवेद शाखा के छान्दोग्य उपनिषत् के 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य का अर्थ बताने के लिये पहले 'तत्' पद का लक्ष्य अर्थ बताया जाता है] सृष्टि से पहले जो सजातीय, विजातीय और स्वगत भेद से शून्य, तथा नामरूप से रहित सद्धस्तु 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' इस श्रुति में बतायी गई है, सृष्टि बन जाने के बाद अब भी वह सद्धस्तु वैसी की वैसी ही है, यह बात विचार दृष्टि से ही देखने की है । उस सद्धस्तु में अब भी कोई विकार नहीं आया है 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य का 'तत्' शब्द उसी की ओर को इशारा कर रहा है [तत् शब्द के उस लक्ष्यार्थ तक केवल अधिकारी की ही उदार दृष्टि पहुँच सकती है । जिसका यह देह अन्तिम देह हो,जिसको इस देह के पश्चात् दूसरा देह मिलना ही न हो,उसी को हम अधिकारी देह कहते हैं। सब से पिछले देह को ही विद्याधिकारी देह भी कहा जाता है। ] श्रोतुर्देहेन्द्रियातीतं वस्त्वत्र त्वंपदेरितम् एकता ग्राह्यतेऽसीति तदैक्यमनुभूयताम् ॥६॥ [अब 'तत्त्वमसि' के 'त्वं' पद का लक्ष्यार्थ बताया जाता है] श्रवणादि का अनुष्ठान करके जिसने इस महावाक्य को समझना है, उसके देहेन्द्रियों किंवा तीनों देहों से अलग रहने वाला, उसके तीनों देहों का साक्षी, जो कोई भी पदार्थ है, उसीको इस महा वाक्य का 'त्वं' पद लक्षणा से कह रहा है। इसी वाक्य के 'असि' पद से 'तत्' और 'त्वं' दोनों पदों में रहने वाली एकता का ग्रहण अधिकारी को कराया जाता है। मुमुक्षु लोगों को चाहिये कि उन 'तत्' और 'त्वं' पदार्थों की जो एकता अब प्रमाण- पुष्ट हो चुकी है उसका दिव्यानुभव वे भी ले लें।