पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३२२ पञ्चदशी स्वप्रकाशापरोक्षत्वमयमित्युक्तितो मतम् । अहंकारादिदेहान्तात् प्रत्यगात्मेति गीयते ॥७॥ [अब क्रमानुगत अथर्ववेद के अयमात्माब्रह्म इस वाक्य के अर्थ का व्याख्यान करते हुए 'अयम्' और 'आत्मा' इन दोनों का जो अभिप्राय है उसको क्रम से दिखाया जाता है] जो तत्व स्वयं प्रकाश होने के कारण ही प्रत्यक्ष हो रहा हो, उसको इस महावाक्य का 'अयम्' शब्द कह रहा है। क्योंकि यह तत्व धर्माधर्मादि के समान सदा परोक्ष रहने वाला नहीं है तथा घटादि के समान दृश्य पदार्थ भी नहीं है । अहंकार से लेकर देहपर्यन्त (अहंकार प्राण मन इन्द्रिय तथा देह का) जो संघात है,उस सभी का अधिष्ठान तथा सभी का साक्षी होने के कारण जो तत्व सभी से प्रत्यक् है, किंवा सभी का आन्तर है, इस महावाक्य में उसी को 'आत्मा' कहा गया है । क्योंकि वह तो सभी के अन्दर व्याप्त रहने वाली वस्तु है । दृश्यमानस्य सर्वस्य जगतस्तत्वमीर्यते । ब्रह्मशब्देन, तद् ब्रह्म स्वप्रकाशात्मरूपकम् ॥८॥ [अब 'अयमात्मा ब्रह्म' इस महावाक्य के ब्रह्म शब्द का जो अर्थ विवक्षित है उसका वर्णन किया जाता है] इस दृश्यमान क्षणभंगुर जगत् का जो सत्य तत्व है, उसी को 'ब्रह्म' शब्द कह रहा है । स्वयंप्रकाश तथा आत्मरूप जो ब्रह्म है वह यह आत्मा ही तो है । सब को सदा प्रत्यक्ष रहने वाले इस आत्मा से भिन्न कोई भी ब्रह्म नामका तत्व नहीं है । आकाशादि जगत्, जो कि दृश्य होने के कारण ही मिथ्या है, इस जगत् का जो अधिष्ठान है—इस जगत् की बाधा हो