भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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चित्रदीपप्रकरणम् १३१ निरूपण करना छोड़कर जलाकाश का निरूपण इस श्लोक में किया जाता है ] घट के अन्दर के आकाश में जो जल भरा है, उस जल में जो मेघ और नक्षत्र सहित आकाश प्रतिबिम्बित हो रहा है, उसी को यहाँ 'जलाकाश' कहा जाता है । महाकाशस्य मध्ये यन्मेघमण्डलमीक्ष्यते । प्रतिबिम्बतया तत्र मेघाकाशो जले स्थितः ॥२०॥ इस महाकाश में जो मेघमण्डल दीखता है [ उस मेघ- मण्डल में जो जल रहता है ] उस जल में प्रतिबिम्बित जो आकाश है वही 'मेघाकाश' कहाता है । मेघांशरूपमुदकं तुषाराकारसंस्थितम् । तत्र खप्रतिबिम्बोऽयं नीरत्वादुन्मीयते ॥२१॥ मेघ का अंश रूपी जो जल होता है वह तुपार के [ बहुत छोटे से ] आकार में रहता है । जल होने के कारण यह अनु- मान कर लिया जाता है कि उसमें भी आकाश का प्रतिबिम्ब होगा ही । अधिष्ठानतया देहद्वयावच्छिन्नचेतनः । कूटवन्निर्विकारेण स्थितः कूटस्थ उच्यते ॥२२॥ [ स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही प्रकार के देह अविद्याकल्पित हैं, उन ] दोनों देहों का अधिष्ठान होने से जो चेतन दोनों देहों से अवच्छिन्न (घिरा.हुआ) हो रहा है, उसी चेतन को 'कूटस्थ' कहते हैं। क्योंकि वह लुहारे के कूट [ ऐरन= जिस लोहे पर रखकर दूसरे लोहे ठोके पीटे जाते हैं, परन्तु जो स्वयं सदा एक सा बना रहता है ] के समान निर्विकार रहता है इससे उसे 'कूटस्थ' कहा जाता है ।